आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने सोमवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए बद्ध चेतन, अबद्ध चेतन, सदभूत-असदभूत व्यवहारनय को समझाया। आचार्यश्री ने युवाओं को भी प्रेरणास्पद बातों से अभिभूत किया। दीक्षा कल्याणक भी मनाया गया। इस अवसर पर सिद्ध क्षेत्र सिद्धवरकूट में पं.राकेश जैन भिंड ने 7 प्रतिमा के व्रत अंगीकार किए। सनावद से पढ़िए राजेंद्र जैन महावीर की यह खबर…
सनावद। भारत का कण-कण पवित्र है। भारत भूमि ढाई द्वीप में ऐसा कोई स्थान नहीं है। जहाँ से मुनि मोक्ष न पधारे हों। आज विदेशों में जैन ग्रंथों की खोज से कई शोध किए जा रहे हैं। जीवत्व की दृष्टि से हम सब स्वजातीय हैं। पुद्गल, अजीव विजातीय हैं। द्रव्य-गुण-पर्याय के बाहर जगत में कुछ भी नहीं है। विश्व की रचना परमाणु से, परमाणु का वर्णन वस्तुत्व की दृष्टि से जैन ग्रंथों में हैं। सिद्धवरकूट सिद्ध क्षेत्र का कण-कण पवित्र है। यहाँ दो चक्री दस कामकुमार मुनिराज सहित साढ़े तीन करोड़ मुनिराजों ने मोक्ष प्राप्त किया है। कूट के नाम से प्रसिद्ध भारत का एकमात्र तीर्थ सिद्धवरकूट है। यह उद्बोधन आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने सिद्धक्षेत्र सिद्धवरकूट में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के द्वितीय दिवस बद्ध चेतन, अबद्ध चेतन, सदभूत-असदभूत व्यवहारनय को समझाते हुए व्यक्त किए। आचार्य श्री ने कहा कि आज सिद्धवरकूट तीर्थ के निर्जन स्थानों का भ्रमण किया तो अहसास हुआ कि सिद्धवरकूट शांत शीतल स्थान है। यहाँ बाहर में भले ही तपन हो लेकिन, आत्मिक शीतलता का स्थान सिद्धवरकूट है। जहाँ अंतरआत्मा के दर्शन हो सकते हैं। गणधर मुनि श्री विवर्धन सागर जी महाराज ससंघ, अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज, गणिनी आर्यिका विशिष्टश्री माताजी ससंघ उपस्थित रहे। मुनि श्री सौम्य सागरजी महाराज ,आर्यिका विविक्त श्री माता जी ने भी संबोधित किया।
श्रद्धावान को पाषाण में भी भगवान दिखते हैं
आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि शिल्पकार को पाषाण में मूर्ति दिखती है। वहीं श्रद्धावान को पाषाण में परमात्मा दिखते हैं। हमें कभी व्यक्ति के राग-द्वेष में नहीं पड़ना चाहिए। व्यवस्था मत बनाइये, व्यवस्थित रहना शुरू कीजिए। व्यवस्था अपने आप बन जाएगी। गाड़ी पर बैठने के लिए कभी गाड़ी पर मत बैठिए। मंजिल पर पहुंचने के लिए गाड़ी में बैठिए। युवाओं को मार्गदर्शन देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि चेहरा देखकर कभी विवाह मत करना, गुण, धर्म को देखकर विवाह कीजिए। ध्यान रहे संतान नहीं होगी तो संत नहीं होंगे, संत नहीं होंगे तो अरिहंत नहीं होंगे, अरिहंत नहीं होंगे तो सिद्ध भगवान भी नहीं होंगे। श्रेष्ठ कार्य का कोई पंथ नहीं होता, श्रेष्ठ कार्य हर किसी का होता है। अपने गुरु गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज की शिक्षाओं को याद करते हुए कहा कि उन्होंने मुझे जितना सिखाया है। उसे में शब्दों में बता सकूं। मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है। ध्यान रहे सज्जन असमर्थ हमेशा प्रशंसा करता है, दुर्जन असमर्थ हमेशा निंदा करता है।
सुव्रत सागर जी सहित पांच मुनिराजों ने किए कैशलोच
आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज के परमशिष्य मुनि श्री सुव्रत सागर जी, निसंग सागर जी, निग्रंथ सागर जी, निर्माेही सागर जी महाराज ने अपने उत्कृष्ट केशलोच किए। पांचों मुनियों ने सोमवार सुबह अपने हाथों से अपने मुख और सिर के बालों को हाथों से घास की भांति उखाड़ना प्रारंभ कर दिया। मुनि श्री सुव्रत सागर जी ने बताया कि सिद्ध भूमि पर अपने केशलोच करना हमारा सौभाग्य है। पांचों मुनिराजों ने उपवास भी किए।
सिरिभूवलय की प्रतियां भेंट की
जैन गणित का अद्भुत ग्रंथ सिरिभूवलय पर कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ इंदौर द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी ज्ञानपीठ अध्यक्ष अमित कासलीवाल, प्रबंधक अरविंद जैन आदि ने आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी को संस्थान व सिरिभूवलय योजना की जानकारी देते हुए उन्हें पुस्तक भेंट की व कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ इंदौर पधारने का आग्रह किया।













Add Comment