भगवान महावीर स्वामी की पावन जन्मस्थली बासोकुंड, वैशाली स्थित ऐतिहासिक ‘प्राकृत जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान’ को बंद करने की सरकारी अधिसूचना पर देशभर में तीखा विरोध शुरू हो गया है। इंदौर/बदनावर से पढ़िए, यह खबर…
इंदौर/बदनावर। भगवान महावीर स्वामी की पावन जन्मस्थली बासोकुंड, वैशाली स्थित ऐतिहासिक ‘प्राकृत जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान’ को बंद करने की सरकारी अधिसूचना पर देशभर में तीखा विरोध शुरू हो गया है। स्थानीय वर्द्धमानपुर शोध संस्थान एवं सकल जैन समाज ने माननीय प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बिहार एवं राज्यपाल महोदय को ज्ञापन भेजकर अधिसूचना तत्काल रद्द करने की मांग की है।
क्या है मामला
इस संस्थान का शुभारंभ स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने महावीर जन्म कल्याणक उत्सव, चौत्र शुक्ल त्रयोदशी वीर निर्वाण संवत 2482, तदनुसार 23 अप्रैल 1956 को किया था। लगभग 70 वर्षों से यह संस्थान प्राकृत भाषा, जैन आगम और अहिंसा दर्शन पर शोध का विश्व का एकमात्र केंद्र रहा है। वर्तमान में एक सरकारी प्रस्ताव के तहत इसे बंद करने की अधिसूचना जारी की गई है, जिसका जैन समाज और भाषा प्रेमियों ने सख्त विरोध जताया है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि 70 वर्ष पूर्व भारत सरकार ने संस्कृत, प्राकृत और पाली की त्रिवेणी को संरक्षित करने के लिए तीन अलग शोध केंद्र स्थापित किए थे। इन केंद्रों ने हजारों विद्वान देश को दिए। प्राकृत भाषा का प्रतिनिधित्व करने वाले इस इकलौते संस्थान को षड्यंत्रपूर्वक बंद करना भारतीय ज्ञान परंपरा को नष्ट करने का उपक्रम है। इसे कोई भी भारतीय विद्वान बर्दाश्त नहीं कर सकता। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद से आंदोलन गतिमान है, राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ के आह्वान पर देशभर के प्राकृत प्रेमियों एवं जैन समाज ने केंद्र व बिहार सरकार को ज्ञापन सौंपकर अधिसूचना रद्द करने की मांग की है।
ज्ञापन में मांग
वर्द्धमानपुर शोध संस्थान एवं दिगम्बर जैन समाज, बदनावर सहित अन्य सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि संस्थान बंद करने की अधिसूचना तत्काल रद्द की जाए। प्राकृत भाषा के विकास हेतु संस्थान को पुनः शुरू कर सुदृढ़ बनाया जाए। पिछले 20 वर्षों से रिक्त पदों पर नियुक्ति कर संस्थान का पुनरुत्थान किया जाए। ज्ञापन भेजने वालों में संस्थान के भोपाल इंदौर बदनावर के कार्यकर्ता और समाजजनों में राजेश जैन फूलजी बा, राजमल सूर्या, मुकेश विनायका, सुरेन्द्र मूणत, राजेश मोदी, विजय बाफना, महेन्द्र सुंदेचा, राजेन्द्र सराफ, अनिल लुनिया, सर्वेश मंडलेचा, सौरभ जैन बिट्टू, हेमंत मोदी, अभिषेक टल्ला, सुशील जैन, पवन पाटोदी, सुशील मोदी, ललित गोधा, विपिन पाटनी, स्वप्निल जैन, ओम पाटोदी सहित नगर के गणमान्य नागरिक शामिल थे।
पृष्ठभूमि
यह संस्थान 19 हजार दुर्लभ पुस्तकों व पांडुलिपियों से सुसज्जित है। यहां जापान, श्रीलंका, कंबोडिया तक के शोधार्थी अध्ययन करते रहे हैं। जैन समाज का आरोप है कि दरभंगा के संस्कृत संस्थान और नालंदा के पाली संस्थान को चलाया जा रहा है लेकिन, प्राकृत संस्थान के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है।













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