दिगम्बर जैन मुनि परंपरा के पुनरुद्धारक प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पुण्य स्मृति में पद-शताब्दी महोत्सव आयोजित हुआ। उनके तप, त्याग और संयम से भरे जीवन ने अनेक साधकों को धर्म मार्ग पर प्रेरित किया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की ख़ास रिपोर्ट…
दिगम्बर जैन मुनि परंपरा के पुनरुद्धारक एवं प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का जीवन तप, त्याग और संयम की अद्वितीय गाथा है। उन्होंने शिथिल होती मुनि परंपरा को पुनः जीवित कर धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की।
जन्म एवं गृहस्थ जीवन:
आचार्य श्री का जन्म 1872 में बेलगांव (कर्नाटक) के येलगुल ग्राम में हुआ। बचपन से ही वैराग्यपूर्ण प्रवृत्ति रखने वाले सातगौड़ा (गृहस्थ नाम) माता-पिता की सेवा और मुनियों के प्रति गहन भक्ति में लीन रहते थे।
संयम जीवन:
1915 में क्षुल्लक, 1920 में मुनि और 1924 में आचार्य पद अलंकृत किया गया। 1934 में गजपंथा में उन्हें “चारित्र चक्रवर्ती” की उपाधि मिली। आचार्य श्री ने अपने जीवन में आगमसम्मत चर्या का अनुपालन कर अनगिनत साधकों को प्रेरित किया।
तप व त्याग:
• 35 वर्षों के मुनि जीवन में लगभग 9938 उपवास किए।
• घी-तेल, नमक, शक्कर आदि का आजीवन त्याग।
• 1947 के “हरिजन मंदिर प्रवेश कानून” विरोध में 1105 दिन तक अन्नाहार का त्याग।
• साधना के मार्ग में सर्प, शेर, चींटी आदि उपसर्गों को भी समता से सहन किया।
विशेषताएँ:
• गुरु श्री देवेंद्रकीर्ति जी ने पुनः उनसे मुनि दीक्षा ली, इसलिए उन्हें “गुरुणा गुरु” कहा गया।
• सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराने का कार्य उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हुआ।
• कुल 88 शिष्यों (मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका) को दीक्षित किया।
समाधि:
84 वर्ष की आयु में 36 दिन की संलेखना साधकर 18 सितम्बर 1955 को कुंथलगिरी में समाधिमरण किया।
आज उनकी पुण्य स्मृति में पद-शताब्दी महोत्सव का आयोजन (1924 से 2024/25) हो रहा है, जो संयम, त्याग और धर्म की अमर परंपरा का स्मरण कराता है।













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