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आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा : भक्ति से शक्ति मिलती है संकल्प शक्ति में बल है


पाषाण, धातु, रत्न की प्रतिमाओं में गुणों का आरोपण कर पूज्यनीय बनाया जाता हैं। यह देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी। उनके सानिध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर गुणों का आरोपण किया गया। प्रतापगढ़ से पढ़िए यह खबर…


प्रतापगढ़। हमने आपने तीर्थंकर नहीं देखे हैं। हो सकता है कि कुछ प्राणी पूर्व जन्म में उस समय रहे हो। तीर्थंकर के बताए मार्ग पर आज दिगंबर गुरुजन चल रहे हैं। यह गुरु आचार्य श्री शांति सागर जी की कृपा से मिल रहे हैं। तीर्थंकरों के जिनालय, जिनवाणी और श्रमण मार्ग का संरक्षण, सुरक्षित उनके अथक प्रयासों की देन है। आचार्य श्री शांति सागर जी की कृपा दृष्टि है कि उन्होंने अनेक कष्ट सहन कर 1100 दिन से अधिक अन्न आहार का त्याग जिनालय संरक्षण के लिए किया। उस समय सारा देश, सारी समाज, विद्वान एक और थे। सबका कहना था कि शासन से कौन मुकाबला कर सकता है किंतु 1100 दिन 3 वर्ष केवल दूध और पानी ही लिया। अन्य दो रस तो उन्होंने दीक्षा के पूर्व से ही त्याग दिए थे। यह देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की बिंब प्राण प्रतिष्ठा के बाद धर्म सभा में दी। रविवार को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर गुणों का आरोपण किया गया। राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि प्रतापगढ़ का सौभाग्य है कि आचार्य शांति सागर जी ने वर्ष 1936 में शांतिनाथ तीर्थ में वर्षायोग कर पंचकल्याणक कराया था और यहां पर उन्होंने दीक्षाएं भी दी थी।

दिगंबर अर्थात जिसकी दिशा अंबर है
प्रतापगढ़ का एक दुर्भाग्य रहा कि आचार्य श्री शांति सागर जी द्वारा प्रतिष्ठित 1008 पारसनाथ भगवान की प्रतिमा श्री शांतिनाथ जिनालय में विराजित होनी थी किंतु, कुछ कारणों से वह प्रतिमा संघपति मोतीलाल गेंदल मल जवेरी परिवार ने मुंबई-कालका देवी मार्ग पर स्वयं के निजी भवन आवास को तोड़कर वहां भव्य जिनालय बनाकर उसमें विराजित की। प्रतापगढ़ देश का वह नगर है,जहां आचार्य शांति सागर जी, वीरसागर जी, शिवसागर जी धर्मसागर जी अजीतसागर जी और हमने भी कुछ आचार्य ने मुनि अवस्था में वर्षायोग किया है। दिगंबर अर्थात जिसकी दिशा अंबर है। जो वस्त्र रहित दिगंबर साधु होते हैं। आप सभी को देव शास्त्र गुरु के प्रति भक्ति रखना चाहिए क्योंकि, भक्ति से आनंद है और भक्ति में ही शक्ति मिलती है संकल्प शक्ति में बल है।

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