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पूजा, आराधना सभी में भावना का अमूल्य स्थानः  आचार्य सुन्दर सागर जी महाराज

आचार्य सुन्दर सागर जी महाराज का भक्तों को सम्बोधन

प्रतापगढ़ । आचार्य सुन्दर सागर जी महाराज ने जैन धर्मावलम्बियों को सम्बोधित करते हुए कहा है कि जैन शासन कहता है कि पहले अपना हित करो और फिर सामर्थ्य हो तो पर का हित करो। मेरे मार्ग में सहयोग करो। जैन धर्म में भावना का अमूल्य स्थान है। पूजा, आराधना सभी क्रियाओं में भावना का होना अति आवश्यक है और उसका अमूल्य स्थान है। भावना का मतलब आपका परिणाम विशुद्धि होती है। शुद्ध और अशुद्ध भावना थोड़ा बना रहे हो तो साधु आहार का चौका का फल नहीं। क्योंकि भावना चौके के नहीं, खाना खाने की है। भावना अच्छी बनाना आपके मन पर निर्भर करती है। मन में भावना शुद्ध योग हो तो भावना भी शुद्ध रहेगी।

आचार्य सुन्दर सागर जी महाराज ने अपने भक्तों को सम्बोधन में कई उदाहरण भी दिए। उन्होंने कर्म का उदय और कर्म के क्ष के बारे में विस्तार से वर्णन किया। कहा कि जैन धर्म अनादि और विशाल है।

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