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चार धाम मार्ग पर अलकनंदा तट पर स्थित है 128 वर्ष पुराना जिनालय : श्रीनगर में प्राचीन जैन मंदिर के दर्शन कर भावविभोर हुए तीर्थयात्री


चारधाम यात्रा के मार्ग में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित श्रीनगर का प्राकृतिक सौंदर्य और जैन तीर्थ यात्रियों को दिव्यता से भर देता है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान एवं समर्थ सिटी के तीर्थयात्री अष्टापद यात्रा से लौटते समय श्रीनगर के प्राचीन जैन मंदिर पहुंचे और वहां दर्शन-पूजन का सौभाग्य प्राप्त किया। पढ़िए ओम पाटोदी की रिपोर्ट…


इंदौर। चारधाम यात्रा के मार्ग में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित श्रीनगर का प्राकृतिक सौंदर्य और जैन तीर्थ यात्रियों को दिव्यता से भर देता है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान एवं समर्थ सिटी के तीर्थयात्री अष्टापद यात्रा से लौटते समय श्रीनगर के प्राचीन जैन मंदिर पहुंचे और वहां दर्शन-पूजन का सौभाग्य प्राप्त किया।

इस अवसर पर समर्थ सिटी के यात्रियों द्वारा पंच परमेष्ठि विधान आयोजित किया गया, जिसमें शशिप्रभा जबलपुर, शशिप्रभा सोनागिर, शैलेन्द्र–अनुभा चंदेरिया, ओम कीर्ति पाटोदी, अनिल–संध्या जैन, संतोष–अनिता जैन, चहेती पाटोदी सहित अनेक श्रद्धालु शामिल हुए।

वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने जानकारी दी कि श्रीनगर जैन समाज के अध्यक्ष श्री मनोज कुमार जैन के अनुसार यह जिनालय लगभग 128 वर्ष पुराना है, जिसमें मूलनायक भगवान आदिनाथ की प्राचीन श्वेत संगमरमर की प्रतिमा और भगवान पार्श्वनाथ की दो प्राचीन मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।

नगर के वरिष्ठ इतिहासकार श्री राजेश जैन की पुस्तक “केदार हिमालय के पथ पर (82)” के अनुसार, श्रीनगर के पुराने क्षेत्र में उत्तर दिशा में स्थित बुधवा कड़वा की धर्मशाला से आगे एक भव्य पाषाण निर्मित शिखर वाला जैन मंदिर स्थित था, जिसे अभिलेखों में ‘पारसनाथ मंदिर’ के रूप में जाना गया है। पास में ही बना पक्का कुआँ विशेष उल्लेखनीय है, क्योंकि जैन परंपरा में प्रतिमाओं के अभिषेक हेतु प्राचीन काल से प्राकृतिक जल स्रोतों या कुओं के जल का ही प्रयोग होता रहा है। यह कुआँ अलकनंदा के किनारे होने के बावजूद बनाया गया था, जो इसे विशेष बनाता है।

वर्तमान मंदिर, जो राजकीय बालिका इंटर कॉलेज के पास स्थित है, वास्तव में पुराने मंदिर के पाषाण खंडों से निर्मित है। इन्हें बैलगाड़ियों से लाकर नूतन स्थल पर श्रीनगर के प्रसिद्ध घुन्तु मिस्त्री द्वारा पुनर्निर्मित किया गया। इसका निर्माण स्व. लाला बाल गोविन्द के पुत्र स्व. लाला मनोहर लाल जैन और स्व. लाला धूम सिंह जैन के पुत्र स्व. लाला प्रताप सिंह जैन के संयुक्त प्रयासों से वर्ष 1926 में सम्पन्न हुआ। प्रतिष्ठा वेद सम्मत विधि-विधान से श्रीनगर के प्रकांड विद्वानों द्वारा की गई थी।

वर्ष 1971 में मुनि विद्यानंद जी के श्रीनगर चातुर्मास के दौरान स्व. लाला नेमचंद जैन के दत्तक पुत्र श्री सुखबीर प्रसाद जैन ने मंदिर के पास स्थित लगभग 9 नाली (1800 वर्ग गज) भूमि जैन धर्मशाला निर्माण हेतु मंदिर को दान में दी थी।

श्रीनगर शहर में भव्य गुरुद्वारा, मस्जिद और अनेक प्राचीन हिंदू मंदिर भी स्थित हैं। केदारनाथ-बद्रीनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को श्रीनगर में रुककर इस अति प्राचीन जैन मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए।

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