आचार्यश्री विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी ,मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित होकर चातुर्मासरत हैं। यहां पर मुनियों के प्रवचनों से धर्म सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन धर्मलाभ उठा रहे हैं। नांद्र से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
नांद्रे। आचार्यश्री विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित होकर चातुर्मासरत हैं। यहां पर मुनियों के प्रवचनों से धर्म सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन धर्मलाभ उठा रहे हैं। इस मंदिर में अपने प्रवचन में मुनि श्री जयंत सागर जी ने कहा कि जीवन में हमारे विचार ही हमारे शत्रु और मित्र की वृद्धि कराते हैं, क्योंकि हमारे पास मुख एक है और हम स्वयं एक हैं, इसी एक मुख से हम अमृत तुल्य श्रेष्ठ वचन भी बोल सकते हैं और इसी मुख से हम जहर के तुल्य विष रूपी वचन भी बोल सकते हैं। मित्र! घर को बनाने में, इज्जत बनाने म,ें नाम, सम्मान बनाने में बहुत समय लगता है, परंतु ज्ञानियों ये सब मिटाने में समय नहीं लगता। इसलिए हमें विचार करके अपनी मुख को खोलना चाहिए।
तब कहीं जाकर आप श्रेष्ठ विचारवान बन सकते हैं और तो और आप के समय के माता-पिता को अपने बच्चों के साथ मित्र का व्यवहार करना चाहिए। जिससे कभी भी कोई बात जैसे अपने मित्र से कह देते हैं वैसे ही बच्चे अपने मन की बात अपनी गलती बता सकें। जिससे घर में स्नेह, प्रेम बडे़ और बच्चे-बच्चियां कहीं इधर-उधर न भटकें। कहीं गलत न हो बच्चों के साथ, इसलिए बच्चों में प्रेम, वात्सल्य बढ़ाओ और उनके विचारों में आप मित्र बन लेंगे तो आप श्रेष्ठ विचारवान बन सकते हैं इसलिए विचारों से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।













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