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मुनि सुधासागर जी महाराज के प्रवचन : अंतरचेतना ही होती है कल्याणकारी


मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि हम जिन रास्तों पर चल रहे हैं, वह रास्ते अंजाने हैं। जाने हुए रास्तों पर चलना कोई बड़ी बात नहीं है, जो रास्ते हम जानते हैं वह आज तक किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…


टीकमगढ़। पारसनाथ दिगंबर जैन, मंझार मंदिर में निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक गंभीर सागर जी महाराज विराजमान हैं। प्रतिदिन मुनि श्री के प्रवचन एवं शाम को जिज्ञासा समाधान का आयोजन किया जा रहा है। मंच संचालन अमित भैया, जबलपुर द्वारा किया जा रहा है। मंझार जैन मंदिर के नव निर्माण की तैयारी चल रही है। शनिवार को मुनि श्री 8:30 बजे मंच पर विराजमान हुए।

मुनि श्री के पाद प्रक्षालन एवं चित्र आनावरण एवं शास्त्र भेंट का कार्यक्रम संपन्न हुआ। मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि हम जिन रास्तों पर चल रहे हैं, वह रास्ते अंजाने हैं। जाने हुए रास्तों पर चलना कोई बड़ी बात नहीं है, जो रास्ते हम जानते हैं वह आज तक किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं। हम उन रास्तों को रास्ते मानते हुए जिंदगी समाप्त कर देते हैं।

मुनिश्री ने कहा कि मरते समय व्यक्ति अधूरा मरता है, अतृप्त होकर मरता है। हमें लगता जैसे भी कुछ और बाकी है, प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिंदगी को पूर्ण तृप्त नहीं छोड़ता है। सोचता है कि मैं पूर्ण हो जाऊंगा लेकिन पूर्ण नहीं होता। गर्मी में जब प्यास लगती है तो हम पानी पीकर पेट तो भर लेते लेकिन कंठ सूखा रह जाता। हमें पानी पीने की इच्छा तो है लेकिन पेट भरा हुआ है। इसी प्रकार इस जिंदगी में होता है। कुछ करने की इच्छा है लेकिन करने लायक रहा नहीं। चलने की इच्छा है लेकिन चलने लायक रहा नहीं। कुछ देखने की इच्छा है लेकिन देखने लायक रहा नहीं।

कुछ सुनने की इच्छा है लेकिन सुनने लायक नहीं रहा। कुछ ऐसा मन है कि मैं कुछ और करूं लेकिन करने लायक नहीं रहा। यह जीवन का अटल सत्य है। मुनि श्री ने कहा कि महावीर भगवान का जीव 10 भव पहले खूंखार शेर की पर्याय में था। एक दिन वह जीवित हिरण को पकड़कर फाड़ रहा था। उसी समय आकाश मार्ग से दो मुनिराज निकले। उन्होंने यह दृश्य देखा। उनके मन में विचार आया यह शेर तो बड़ा पापी है, निर्दयी है लेकिन मुनिराज ने उस शेर को पापी कहके संबोधित नहीं किया।

उससे कहा, अहो भावी तीर्थंकर, अहो भावी भव्य जीव, अहो आसन भव्य जीव कह कर संबोधित किया। मुनिराज के शब्द सुनकर शेर का जीव कहता है, मुझे तो आज तक किसी ने अच्छा नहीं कहा। आप कौन हैं जो मुझे अच्छे से संबोधित कर रहे हैं। मुनिराज के शब्द शेर की समझ में नहीं आए लेकिन गुरु की भाव वाचना को शेर ने भली-भांति समझ लिया। मुनि श्री ने कहा कि साधु की जो अंतर चेतना होती है और बहुत ताकतवर होती है। वह आत्म कल्याण करने वाली होती है और साधु के अंदर जो वेदना होती है, बहुत खतरनाक होती है।

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