सर्वप्रथम योग की शिक्षा आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान ने दी थी। स्वयं आदिनाथ स्वामी ने योग धारण कर केवलज्ञान की प्राप्ति की थी। योग और ध्यान भारत की सबसे प्राचीन साधना हैं। ध्यान और साधना द्वारा अनेकों ऋषि मुनियों, तपस्वियों ने अलौकिक ज्ञान एवं रिद्धियों की प्राप्ति की है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने ज्ञानतीर्थ जिनालय में योग दिवस के अवसर पर योगाभ्यास कर रहे साधर्मी बंधुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। सर्वप्रथम योग की शिक्षा आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान ने दी थी। स्वयं आदिनाथ स्वामी ने योग धारण कर केवलज्ञान की प्राप्ति की थी। योग और ध्यान भारत की सबसे प्राचीन साधना हैं। ध्यान और साधना द्वारा अनेकों ऋषि मुनियों, तपस्वियों ने अलौकिक ज्ञान एवं रिद्धियों की प्राप्ति की है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने ज्ञानतीर्थ जिनालय में योग दिवस के अवसर पर योगाभ्यास कर रहे साधर्मी बंधुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मुख्य रूप से योग के चार बिंदु होते हैं। ध्यान, प्रणायाम, प्रतिक्रमण और सामायिक, योग एवं ध्यान मन वचन काय द्वारा स्वस्थ मन से सकारात्मक सोच के साथ करना चाहिए। नकारात्मक सोच के साथ कभी भी योग व ध्यान नहीं करना चाहिए। प्रसन्नचित होकर मन वचन काय की एकाग्रता से किया गया योग हमें निरोग व स्वस्थ रखता है, हमारा मनोबल बढ़ाता है, मन को शांति प्रदान करता है। मुनिश्री ने कहा कि हमें प्रतिदिन प्रातःकालीन वेला में कुछ समय आवश्यक रूप से योग एवं ध्यान करना चाहिए। यदि हम नियमित रूप से योग करेंगे तो हमें डॉक्टरों के पास नहीं जाना पड़ेगा और न ही दवाओं पर पैसा खर्च करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि योग के साथ ही प्रभु का, अपने इष्ट का ध्यान अवश्य करें, प्रभु से प्रार्थना करें कि हे भगवन इस संसार के सभी जीव सुखी रहें, स्वस्थ रहें। सभी प्राणियों का जीवन मंगलमय हो।
मुनिराज ने योग की महिमा को समझाते हुए कहा कि पहला सुख निरोगी काया। यदि आप स्वस्थ हैं, आपको कोई बीमारी नहीं हैं तो आप सबसे सुखी व्यक्ति हैं। निरोगी रहने के लिए नित्य नियम से योग एवं ध्यान करना चाहिए। प्राचीन समय में योग और ध्यान का अधिक प्रचलन था। वर्तमान में लोग योग और ध्यान जैसी साधना से विमुख होते जा रहें हैं। मुनिश्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोधसागर महाराज का मंगल आगमन ज्ञानतीर्थ पर हुआ। महिलाओं ने रंगोली बनाकर, सिर पर मंगल कलश रखकर एवं साधर्मी बंधुओं ने युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन व आरती उतारकर भव्य अगवानी की
ज्ञानतीर्थ का प्राकृतिक वातावरण मन को मोह लेता है
पूज्य गुरुदेव ने ज्ञानतीर्थ क्षेत्र को मनमोहनी बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञानतीर्थ का शांतप्रिय वातावरण साधना के लिए अति उत्तम स्थान है। यहां का प्राकृतिक वातावरण मन को मोह लेता है। ऐसा स्थान साधना और ध्यान के लिए सर्वाेत्तम है। मुख्य सड़क मार्ग पर होने के कारण आम लोगों को भी दर्शनलाभ सुगमता से उपलब्ध होते हैं।
योग, ध्यान सहित हुए अनेकों आयोजन
पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में एबी रोड हाइवे पर स्थित ज्ञानतीर्थ जिनालय में विभिन्न कार्यक्रम किए गए गए। मुनिश्री ने अंतराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर उपस्थित सभी बंधुओं, माता बहनों को योगाभ्यास एवं ध्यान कराया। श्री जिनेंद्र प्रभु के कलशाभिषेक, शांतिधारा एवं अष्टदृव्य से पूजन किया गया।
23 जून को होगा बड़े जैन मंदिर में भव्य मंगल आगमन
मुनिराज 23 जून को ज्ञानतीर्थ जिनालय से बड़ा जैन मंदिर मुरैना के लिए पद विहार करेंगे। गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में मुनिराजों को नगर भ्रमण कराते हुए बड़े जैन मंदिर में प्रवेश कराया जाएगा। स्थान स्थान पर मुनिराजों की आरती, पाद प्रक्षालन किया जाएगा। साधर्मी महिलाएं मंदिर जी के मुख्यद्वार पर रंगोली सजाकर, सिर पर कलश धारण कर एवं पुरुष वर्ग पाद प्रक्षालन कर मुनिसंघ की भव्य अगवानी करेंगे।
20 जुलाई को होगी चातुर्मास मंगल कलश स्थापना
मुनिराजों का मंगल वर्षायोग 2025 मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में होने जा रहा है। वर्षायोग मंगल कलश स्थापना पर 20 जुलाई को विशाल समारोह होगा, जिसमें गुरुदेव के भक्तों द्वारा मंगल कलशों की स्थापना की जाएगी। इस समारोह में सम्पूर्ण भारत वर्ष से सैकड़ों की संख्या में गुरुभक्त साधर्मी बंधुओं के उपस्थित होने की संभावना को देखते हुए सभी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।













Add Comment