हमें जीवन कैसे जीना है, ये आना चाहिए। हमको इसे जीना आना चाहिए। लोग दुखी क्यों होते हैं, क्यों अवसान में चले जाते हैं ? क्यों दूसरों को कोसते हैं ? इस सबका कारण ये है कि हम वास्तविकता को नहीं समझ पाए। उक्त विचार आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज ने बताशा बाजार, भिण्ड के जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट….
भिण्ड। जिन्दगी बहुत छोटी है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है। मनुष्य पर्याय हमें पुण्य से मिली है। हम इस मानव पर्याय को, अपने जीवन को यू हीं व्यतीत न करें। हमें जीवन अनुशासित तरीके से संयम पूर्वक वास्तविकता में जीना चाहिए। हमें जीवन कैसे जीना है, ये आना चाहिए। हमको इसे जीना आना चाहिए। लोग दुखी क्यों होते हैं, क्यों अवसान में चले जाते हैं ? क्यों दूसरों को कोसते हैं ? इस सबका कारण ये है कि हम वास्तविकता को नहीं समझ पाए। उक्त विचार आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज ने बताशा बाजार, भिण्ड के जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

वास्तविकता दुखी नहीं होने देती
पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि लोगों के दुखी होने का कारण हैं दूसरों और वस्तुओं पर भरोसा। जबकि इस संसार का परम सत्य है कि कोई किसी का नहीं हैं । बस इन पंक्तियों को अपने दिल व दिमाग में बसा लेना चाहिए। जो चाहिए, वह नहीं मिला तो आप दुखी हो जाते हैं, अरे विचार तो करो कि वो वस्तु या वो व्यक्ति तुम्हारे भाग्य में होता तो कुछ भी कोई कर ले, तुमसे अलग नहीं कर सकता और अगर कोई वस्तु या व्यक्ति आपका नहीं हो सका, वह आपके भाग्य में था ही नहीं। आप कितने भी प्रयत्न कर लेना, कितने भी हाथ पांव मार लेना, कितना भी पुरुषार्थ कर लेना, कुछ भी कर लेना, लेकिन भाग्य से ज्यादा मिल ही नहीं सकता। ऐसे में दुखी होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। दुखी करता है आपको आपका अज्ञान, वह व्यक्ति या वस्तु आपको महसूस कराते हैं जबकि वो आपका हो ही नहीं सकता। सही अर्थों में यदि कहा जाए तो वास्तविकता कभी किसी को दुखी नहीं होने देती।













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