हम प्रतिदिन क्रिया पूर्ण करने के उद्देश्य से पूजा करते हैं अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा नहीं करते हैं अगर हम अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा करेंगे तो हमें उल्लास आएगा आनंद आएगा और हमारे कर्मों का नाश होगा। पढ़िए जीवन जैन की रिपोर्ट…
नागदा। स्थानीय पार्श्व प्रधान पाठशाला में चातुर्मास की आराधना के दौरान विराजित साध्वी श्री मुक्ति दर्शना श्रीजी मरासा ने बताया कि जिनालय जी में जब हम पूजा करने जाते हैं तो हमें बहुत जल्दी रहती है इसलिए हम घीसी हुई केसर का उपयोग कर लेते हैं जबकि घीसी हुई केसर का उपयोग करने का प्रावधान शास्त्रों में सक्षम व्यक्ति के लिए बताया है।
हमारा धर्म भाव प्रधान है
हम प्रतिदिन क्रिया पूर्ण करने के उद्देश्य से पूजा करते हैं अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा नहीं करते हैं अगर हम अनुष्ठान पूरा करने के उद्देश्य से पूजा करेंगे तो हमें उल्लास आएगा आनंद आएगा और हमारे कर्मों का नाश होगा। यही आनंद श्रीपाल मेयना की जो कहानी हम साल में दो बार सुनते हैं उसमें भी मेयना रानी द्वारा प्रभु की पूजा में पुष्प जो अर्पण किए थे उससे श्रीपाल राजा को आनंद की अनुभूति हुई थी। और उससे श्रीपाल राजा के कर्म कटे थे और श्रीपाल राजा को उच्च भाव प्राप्त हुए थे। हमारा धर्म भाव प्रधान है। क्रियाएं तो साधन मात्र है।
लेकिन हमने बहुत ज्यादा क्रियाओं को महत्व देना शुरू कर दिया है। हमारा उद्देश्य किसी भी तरह पूजा की क्रिया हो जानी चाहिए। लेकिन अनुष्ठान के अनुरूप पूजा करने का प्रयास नहीं किया जाता है। हम टाइम पास के लिए पूजा करते हैं। पूजा के लिए टाइम पास नहीं करते हैं। हमें पूजा करने की व्यवस्था की चिंता है। हमें पूजा की चिंता नहीं है। हम तीन हजार पांच सौ चढ़ाव चढ़कर शत्रुंजय महातीर्थ में दादा के दर्शन करने जाते हैं। लेकिन हम जैन धर्म में जैन तीर्थ पर जाते हैं और जैन धर्म के सिद्धांत का पालन नहीं करते हैं।
हम तीर्थ यात्रा पर हमारे कर्मों का क्षय करने के लिए जाते हैं लेकिन जिन शासन के निर्देशों का पालन नहीं करते हुए रात्रि भोज एवं होटल एवं लारी का खाना बंद नहीं करके हम अपने पाप कर्म का बैलेंस बढ़कर आ जाते। इस अवसर पर शमशान का उदाहरण देते हुए महाराज साहब ने बताया कि मरे हुए को जलने के लिए शमशान है ना कि शमशान के लिए लोग मरते हैं इसी तरह बाजार में होटल एवं लारिया है उसका उपयोग करना तीर्थ यात्रा के दौरान जिन धर्म के नियमों के अनुकूल नहीं है।
ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी आत्मा को बिगाड़ देता है
हम समाज और सब परिवार तीर्थ यात्रा करते हैं इसको हमें धर्म अनुकूल बनाकर तीर्थ यात्रा करना चाहिए। शत्रुंजय महातीर्थ में नवकारसी का पालन करने पर एक उपवास का लाभ होता है. एक साधु को दान देने पर 100000 साधु को दान देने का लाभ होता है. एक उपवास करने पर सौ उपवास का लाभ होता है। विधि द्वारा क्रिया किए गए कार्य पर ही हमें पूर्ण लाभ प्राप्त होता है लेकिन विधि का उल्लंघन करने पर हमें 100 गुना ज्यादा प्राप्त पाप प्राप्त होता है।
इस संदर्भ में महामंत्री पैठड शाह के इतिहास के उदाहरण देते हुए बताया कि ब्रह्मचर्य व्यक्ति ने उनको सवा लाख रुपए लागत की पूजा की वस्त्र दिए थे 32 साल की उम्र में प्राप्त पूजा के वस्त्र को एक अलमारी रखकर रोज इसलिए दर्शन करते थे कि वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं करते हैं। इसलिए इन वस्तुओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं और रोज उनके आंखों से आंसू की धारा बह जाती। पत्नी को जब पता चला तो उसने भी महामंत्री पेथड़ शाह के साथ ब्रह्मचर्य व्रत स्वेच्छा से अंगीकार किया।
जब तक पत्नी ने नहीं पूछा महामंत्री ने अपनी बात बता कर अपना निर्णय जबरन नहीं थोपा। उक्त पूजा के वस्त्रों में इतनी ताकत हो गई थी कि किसी को भी बुखार आता और वह पूजा के वस्त्र ओड़ा दिए जाते तो बुखार समाप्त हो जाता था। महामंत्री विधि पूर्वक पूजा करते थे इसका ही इतना बड़ा प्रभाव था। आगे यह भी बताया कि जो ईर्ष्या करता है वह दियासलाई जैसा होता है। दूसरों का वह कुछ बिगाड़ कर सके या नहीं बिगाड़ सके। लेकिन स्वयं का बहुत कुछ बिगाड़ लेता है। ईर्ष्या की ताकत बड़ी होती है। वह आप जरूर लगा सकता है लेकिन उस आग में वह स्वयं भी जल जाता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी आत्मा को बिगाड़ देता है यह जानकारी मंच संचालन कर्ता चिराग पावेचा द्वारा दी गई है।













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