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निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया : त्याग और तपस्या का त्योहार है दीपावली – आर्यिका श्री विभाश्री माताजी


वासुपूज्य जिनालय में आर्यिका श्री विभाश्री माताजी ने कहा कि बाहर की साफ सफाई के साथ अन्दर की सफाई का प्रयास इस दिन होना चाहिये, तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता है। आज पर्व को हमने खाने-पीने, पहनने तक कर दिया है जबकि पर्व जीवन में त्याग कर मनाया जाना चाहिए।
पढ़िए प्रदीप बाकलीवाल और राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…


रांची। कार्तिक कृष्ण तेरस के दिन भगवान महावीर ने बिहार के पावापुरी के पदम् सरोवर में योग निरोध धारण किया था, जिस कारण यह कार्तिक कृष्ण माह की ‘तेरस’ धन्य हो गई थी। हमारे इस काल के 24वें तीर्थंकर चौदहवें गुणस्थान के अंतिम दो समयों में अपनी शेष 85 कर्म प्रकृतियों का क्षय कर18000 शीलों का पालन कर मोक्ष प्राप्ति के लिए ध्यानस्थ हुए थे। इसीलिए हम श्रमण संस्कृति के अनुयायी, वर्तमान में जैन धर्मावलम्बी धन्य तेरस मनाते हैं। यह बात!पूज्य गणिनी आर्यिका 105 श्री विभाश्री माताजी ने प्रवचन में कही।

आखिरी उपदेश दिया था

उन्होंने कहा कि इसके ठीक दो दिवस उपरान्त जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था। उस दिन कार्तिक मास की अमावस्या की ही रात थी। इसी दिन भगवान महावीर के प्रमुख गणधर गौतम स्वामी को भी कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। जैन ग्रंथों के मुताबिक महावीर भगवान ने दिवाली वाले दिन मोक्ष जाने से पहले आखिरी बार उपदेश दिया था, जिसे ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ के नाम से जाना जाता है। भगवान के मोक्ष जाने के बाद जैन धर्मावलंबियों ने दीपक जलाकर रोशनी की और खुशियां मनाईं। जैन धर्म के लिए यह त्योहार विशेष रूप से त्याग और तपस्या के त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। इसलिए इस दिन जैन धर्मावलंबी भगवान महावीर की विशेष पूजा करके उनके त्याग और तपस्या को याद करते हैं।

अंदर की सफाई करें

आर्यिका श्री ने कहा कि बाहर की साफ सफाई के साथ अन्दर की सफाई का प्रयास इस दिन होना चाहिये, तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता है। आज पर्व को हमने खाने-पीने, पहनने तक कर दिया है जबकि पर्व जीवन में त्याग कर मनाया जाना चाहिए। दिवाली यानी वीर निर्वाणोत्सव वाले दिन सभी जैन मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। बीते 13 नवम्बर को भगवान महावीर के मोक्ष कल्याणक पर वासुपूज्य जिनालय में प्रमुख पात्रों के द्वारा निर्वाण लाडू कृत्रिम पावापुरी की रचना में चढ़ाया गया। यह रचना बंगाल के कारीगरों के द्वारा की गई थी।।

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