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णमोकार मंत्र ही कल्पवृक्ष और चिंतामणि रत्न है: आर्यिका श्री प्रेक्षामति माताजी ने किया कैशलोच 


श्रीजी और पूर्वाचार्य का चित्र का अनावरण दीप प्रवज्जलन स्थानीय मंडल द्वारा किया जाकर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। शुक्रवार अष्टमी को आचार्य श्री सहित अनेक साधुओं के उपवास थे। संघ में आर्यिका श्री प्रेक्षामति माताजी ने कैशलोचन किया। मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज ने टोंक की धर्म सभा में प्रकट की। टोंक से राजेश पंचोलिया पढ़िए, यह खबर…


टोंक। श्रीमद् जैन धर्म। श्री का अर्थ लक्ष्मी होता है अर्थात जैन धर्म लक्ष्मी युक्त होता है। लक्ष्मी से सबको प्रसन्नता होती है, आपने मनुष्य जन्म में श्रीमद् जैन धर्म प्राप्त किया है, जैन धर्म कल्पवृक्ष और मणि के समान होते हैं। पहले जमाने में कल्पवृक्ष भोग भूमि और स्वर्ग में होते थे, कल्पवृक्ष से जो भी इच्छाएं वस्तु चाहते थे। वह तत्काल मिलती थी। इसी प्रकार रत्नों मणि में भी एक चिंतामणि रत्न होती थी। इसके समीप रहने से सभी कष्ट पीड़ा दूर होती है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज ने टोंक की धर्म सभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 23 वे तीर्थंकर श्री पारसनाथ भगवान को चिंतामणि पारसनाथ कहा जाता है। जैन धर्म से बुद्धि, विद्या, रिद्धि प्राप्त होती है। हमें कल्पवृक्ष या मणि की जरूरत नहीं है। हमारे भीतर भगवान के प्रति श्रद्धा ,विश्वास, भावना और भक्ति है तो जैन धर्म ही कल्पवृक्ष और मणि है। णमोकार मंत्र ही कल्पवृक्ष और मणि है। णमोकार मंत्र ही सभी मंत्रों का राजा है इससे 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।

मंत्रों का जाप विधि पूर्वक आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाता है

राजेश पंचोलिया ने कहा कि आचार्य श्री ने धर्म देशना में णमोकार मंत्र का महत्व बताते हुए बताया कि णमोकार मंत्र में पांच पद अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय और सर्व साधु के होते हैं। एक श्वास लेते समय नमो अरिहंतानम और सांस छोड़ते समय नमो सिद्धांनमः बोलना चाहिए। जैन धर्म केवली भगवान द्वारा प्रतिपादित धर्म है। धार्मिक कार्य आकुलता से रहित होकर करना चाहिए णमोकार मंत्र से बड़ा कोई डॉक्टर और औषधि नहीं है। मंत्रों का जाप विधि पूर्वक आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाता है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री विनम्र मति माताजी का प्रवचन हुआ। अपने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के जीवन के गुणों का वर्णन किया। सातगोड़ा बचपन से पक्षियों के प्रति दया और करुणा का भाव और व्यापार में भी निस्पृह रहते थे। आप ने प्रवचन में बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के पैर में चक्र और ध्वजा का चिन्ह है। जिसका यह अर्थ है कि आचार्य श्री द्वारा बहुत धर्म प्रभावना होगी। सभी को धर्म धारण कर आत्मा का कल्याण करना चाहिए। समाज के प्रवक्ता पवन कंठन एवं विकास जागीरदार अनुसार धर्म सभा में श्रीजी और पूर्वाचार्य का चित्र का अनावरण दीप प्रवज्जलन स्थानीय मंडल द्वारा किया जाकर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। शुक्रवार अष्टमी को आचार्य श्री सहित अनेक साधुओं के उपवास थे। संघ में आर्यिका श्री प्रेक्षामति माताजी ने कैशलोचन किया।

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