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नहीं रहे ‘जैन परंपरा और यापनीय संघ’ के लेखक व मूर्धन्य विद्वान प्रोफेसर रतनचन्द जी जैन भोपाल विद्वत जगत की अपूरणीय क्षति

जैन जगत् के मूर्धन्य विद्वान् *प्रोफेसर रतनचन्द जी भोपाल* का आकस्मिक निधन 01 मार्च 2022 को हो गया है । आप कुछ दिनों से अस्वस्थ थे । आपने अन्तिम समय तक चैतन्य अवस्था में रहते हुए पंचपरमेष्ठी का ध्यान किया और परमपूज्य आचार्य विशुद्ध सागर महाराज और परम पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज से परोक्ष संबोधन भी प्राप्त किया । आपने बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष पद को अलंकृत किया है । आप जैनदर्शन, प्राकृत ,संस्कृत के अधिकारी विद्वान् थे । आप अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी और निर्भीक तथा स्पष्टवादी थे। आदरणीय प्रो ० ( डॉ ० ) रतनचन्द्र जी जैन का जन्म 2 जुलाई 1935 को , मध्यप्रदेश के लुहारी ( सागर ) नामक ग्राम में पिता- स्व ० पं ० बालचन्द्र जी जैन एवं माता – स्व ० श्रीमती अमोलप्रभा जी जैन के यहाँ हुआ था । प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई पश्चात् श्री गणेश दिगम्बर जैन संस्कृत महाविद्यालय , सागर ( म ० प्र ० ) में संस्कृत , प्राकृत , हिन्दी , अंग्रेजी तथा धर्मग्रन्थों का अध्ययन अनन्तर स्वाध्याय के द्वारा मैट्रिक से लेकर एम. ए. ( संस्कृत ) तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं । प्रावीण्यसूची में बी. ए. में दसवाँ स्थान और एम ० ए . में प्रथम स्थान प्राप्त किया। ‘ जैनदर्शन में निश्चय और व्यवहार नय : एक अनुशीलन ‘ विषय पर पी – एच ० डी ० उपाधि प्राप्त की । शा. टी. आर. एस. स्नातकोत्तर महाविद्यालय रीवा ( म ० प्र ० ) , शा ० हमीदिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय भोपाल एवं बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल ( म ० प्र ० ) में स्नातकोत्तर कक्षाओं तक संस्कृत विषय का एवं भाषाविज्ञान की एम. फिल. कक्षा में शैलीविज्ञान का अध्यापन तथा पी – एच. डी. उपाधि के लिए शोधार्थियों का मार्गदर्शन आपने कुशलता से किया। परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी के आदेश से उनकी प्रेरणा से संस्थापित प्रतिभामण्डल की ब्रह्मचारिणी बहनों को दो चातुर्मासों ( सन् 2002 एवं 2003 ) में संस्कृत एवं ‘ सर्वार्थसिद्धि ‘ नामक ग्रन्थ का अध्यापन कराया । आचार्यश्री की ही प्रेरणा से ‘ जैनपरम्परा और यापनीय संघ ‘ ग्रन्थ का लेखन कर ऐतिहासिक कार्य किया।10 वर्ष तक अथक परिश्रम करके आपने *जैन परंपरा और यापनीय संघ* जैसी ऐतिहासिक कृति की रचनाकर (लगभग 3700 पृष्ठों में) बहुत ही श्रमसाध्य कार्य करके विद्वता जगत में अपनी अनूठी मिशाल पेश की थी।

आपके प्रकाशित ग्रन्थ : 1. जैनदर्शन में निश्चय और व्यवहार नय : एक अनुशीलन , 2. जैनपरम्परा और यापनीयसंघ ( तीन खण्डों में ) , 3. जैनधर्म की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि , 4. जैनों की कुछ धारणाओं एवं विधियों की परीक्षा , 5 . जैन इतिहास और साहित्य पर आरोपित मिथ्यामत ।

आपको दिगंबर व श्वेतांबर जैन समाज ने अनेक पुरस्कारों से अलंकृत किया था, जिनमें अहिंसा इंटरनेशनल पुरस्कार, महाकवि आचार्य ज्ञानसागर पुरस्कार, संपादकाचार्य की उपाधि आदि प्रमुख थे।

आप सरल, सौम्य, उदार और परोपकारी व्यक्तित्व के धनी थे ।

आपने सन् 2001 से 2012 तक ‘ जिनभाषित ‘ मासिक पत्रिका का सम्पादन किया, यह पत्रिका आपके कुशल संपादन के लिए जानी जाती थी।

अब से ठीक एक वर्ष पूर्व 02 मार्च 2021 को आपकी नवीन प्रकाशित कृतियाँ 1. जैनधर्म की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि , 2. जैनों की कुछ धारणाओं एवं विधियों की परीक्षा , 3 . जैन इतिहास और साहित्य पर आरोपित मिथ्यामत, मुझे रजिस्टर्ड डाक से प्राप्त हुई थीं ।

मेरा सौभाग्य रहा कि आपका मार्गदर्शन मुझे भी प्राप्त हुआ है। एकबार भोपाल में शहपुरा में आपके आवास पर भी जाने का अवसर मिला।

आपके निधन से विद्वत्समाज एवं जैन समाज को अपूरणीय क्षति हुई है ।

*पूर्ण ना होगी क्षति,आपके इस स्थान की*।

*भाव अर्पित चरणों में,हम दे रहे भावांजलि*।।

विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शोकसंतप्त परिवार के प्रति गहन शोक संवेदना व्यक्त करता हूँ ।

 

डॉ. सुनील जैन संचय ललितपुर

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