मेरे गुरुदेव नीचे देखते हुए वह पूरी धरती को देख लेते हैं। हमारे अंदर दृष्टि से ही ममत्व भाव शांति का संचार कर देते हैं। जिनके तपों बल से तपस्या से हम शुरू से ही जमीन से जुडकर आगे चलते हुए हम ऊंचाइयों पर पहुंच जाते हैं। यह विचार समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी के हैं। इंदौर से पढ़िए, हरिहरसिंह चौहान की यह प्रस्तुति…
इंदौर। मेरे गुरुदेव नीचे देखते हुए वह पूरी धरती को देख लेते हैं। हमारे अंदर दृष्टि से ही ममत्व भाव शांति का संचार कर देते हैं। जिनके तपों बल से तपस्या से हम शुरू से ही जमीन से जुडकर आगे चलते हुए हम ऊंचाइयों पर पहुंच जाते हैं। यह विचार समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी के हैं। गुरु पूर्णिमा पर उनके विचार गुरु, उनकी गुरुता और उनकी कृपा और आशीर्वाद की जीवंत तस्वीर बयां कर रहे हैं।
उन्होंने बताया था कि गुरु जी कहते हैं कि स्वर्ग जाने के लिए नीचे से शुरुआत होनी चाहिए। जो नीचे की ओर जाती है वह नदी कहलाती है, जो स्वच्छ व साफ रहती है और नीचे देख कर आगे बढना वाला व्यक्ति प्यासा होता है। वह ही सफतला पाता है क्योंकि, उसने संयम, साधना, त्याग का मार्ग पर निंरतर आगे बढने का संकल्प ले रखा है। यही गहन चिंतन था महात्यागी, जन-जन के संत, समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी का।













Add Comment