आगरा-मथुरा नेशनल हाईवे पर स्थित अन्तरराष्ट्रीय लोकोदय तीर्थक्षेत्र की भूमि पर निर्यापक श्रमण मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री गंभीरसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में भव्य पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन किया गया। धु के पास तीन उपकरण के अलावा और कुछ भी नहीं होता। पिच्छिका, कमंडल और शास्त्र इन तीन उपकरणों के माध्यम से ही वे अपनी जीवन भर साधना करते रहते हैं। पढ़िए शुभम जैन की रिपोर्ट…
आगरा। आगरा-मथुरा नेशनल हाईवे पर स्थित अन्तरराष्ट्रीय लोकोदय तीर्थक्षेत्र की भूमि पर निर्यापक श्रमण मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री गंभीरसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में भव्य पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन के साथ किया। बाहर से पधारे गुरुभक्तों ने मुनिश्री के चरणों का पाद प्रक्षालन किया।
इस दौरान ग्वालियर, धौलपुर, सागर, अशोकनगर, ललितपुर, झांसी, एत्मादपुर टूंडला, कानपुर, भोपाल के सकल जैन समाज ने मुनिसंघ के समक्ष श्रीफल भेंट कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम के मध्य में अशोक नगर के श्री दिगंबर जैन युवा वर्ग और बालिका मण्डल ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसके बाद चंदयान के माध्यम से मुनिपुंगवश्री की नवीन पिच्छी पन्नालाल बैनाड़ा परिवार ने प्रदान की और मुनि श्री की पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य महेश छाबड़ा परिवार ने प्राप्त किया। क्षुल्लकश्री गंभीर सागर जी महाराज को नवीन पिच्छी प्रदान करने का सौभाग्य मोहिताश जैन, मंजू जैन, महेश जैन, सुधा जैन, संजीव जैन, परिवार बोदला सेक्टर 4 आगरा को प्राप्त हुआ एवं क्षुल्लकश्री की पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य दिनेश जैन एवं बबिता जैन परिवार वालों ने प्राप्त किया l

संयम उपकरण है पिच्छिका
इस अवसर पर निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी ने प्रवचन में कहा कि दिगंबर जैन साधु के पास तीन उपकरण के अलावा और कुछ भी नहीं होता। पिच्छिका, कमंडल और शास्त्र इन तीन उपकरणों के माध्यम से ही वे अपनी जीवन भर साधना करते रहते हैं, संयमोपकरण जिसे पिच्छिका कहते हैं, यह पिच्छिका मोर पंखों से निर्मित होती है। मोर स्वत: ही इन पंखों को वर्ष में तीन बार छोड़ते हैं। उन्हीं छोड़े हुए पंखों को इकट्ठा करके श्रावकगण पिच्छिका का निर्माण करते हैं।
पिच्छिका के माध्यम से मुनिराज अपने संयम का पालन करते हैं। जब कहीं उठते-बैठते हैं तो तब उस समय जमीन एवं शरीर का पिच्छिका के माध्यम से परिमार्जन कर लेते हैं, ताकि जो आंखों से दिखाई नहीं देते, ऐसे जीवों का घात न हो सके। ये पिच्छिका उस समय भी उपयोग करते हैं, जब शास्त्र या कमंडल को रखना या उठाना हो।
जहां शास्त्र या कमंडल रखना हो, वहां पर जमीन पर सूक्ष्म जीव रहते हैं जिन्हें हम आखों से नहीं देख सकते, तो पिच्छिका से उन जीवों का परिमार्जन कर दिया जाता है, ताकि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचे। यह पिच्छिका इतनी मृदु होती है कि इसके पंख आंख के ऊपर स्पर्श किए जाएं तो वह आंखों में नहीं चुभते और जब इन पंखों में लगभग एक साल के भीतर यह मृदुता कम होने लगती है तो इस पिच्छिका को बदल लिया जाता है। इस कार्यक्रम को पिच्छिका परिवर्तन के नाम से जाना जाता है।
ये रहे मौजूद
कार्यक्रम का संचालन मनोज जैन और प्रदीप जैन शास्त्री ने किया। इस अवसर पर प्रदीप जैन पीएनसी, मनोज जैन बाकलीवाल, नीरज जैन जिनवाणी, निर्मल मोठ्या, पन्नालाल बैनाड़ा, हीरालाल बैनाड़ा, राजेश सेठी, अमित जैन बॉबी, पंकज जैन, अनिल जैन शास्त्री, रुपेश जैन, उत्तमचंद जैन, दिलीप जैन, के.के जैन, राजेश बैनाड़ा, पंकज जैन, विवेक बैनाड़ा, शैलेंद्र जैन, विजय धूर्र, अरुण जैन शास्त्री, प्रवीन जैन नेता जी, नरेश जैन, अनिल जैन, दीपक जैन, चक्रेश जैन, मीडिया प्रभारी शुभम जैन, राहुल जैन, उषा मोठ्या, उमा मोठ्या, ममता बाकलीवाल, बीना बैनाड़ा, सोनल जैन सहित आगरा सकल जैन समाज की शैलियों के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।













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