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अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष महत्व : अपनी सामर्थ्य अनुसार करवाएं एक मुनि को आहार


अक्षय तृतीया के दिन राजा श्रेयांस ने मुनि आदिनाथ को प्रथम आहार ईक्षु रस (गन्ने का रस) का दिया। आप भी आज किसी न किसी मुनि को जरूर करवाएं आहार। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन का आलेख… 


आदिनाथ भगवान ने लोगों को षट् कर्म का महत्व बताया और ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य के रूप में वर्ण व्यवस्था समाज को प्रदान की। इसलिए उन्हें आदि पुरुष व युग प्रवर्तक भी कहा जाता है। राजा आदिनाथ को राज्य भोगते हुए जब जीवन से वैराग्य हो गया तो उन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ली तथा 6 महीने का उपवास लेकर तपस्या की। 6 माह बाद जब उनकी तपस्या पूरी हुई तो वह आहार के लिए निकले। जैन दर्शन में श्रावकों द्वारा मुनियों को आहार का दान किया जाता है लेकिन उस समय किसी को भी आहारचर्या का ज्ञान नहीं था। जिसके कारण मुनि आदिनाथ को और 6 महीने तक निराहार रहना पड़ा। बैसाख शुल्क तीज (अक्षय तृतीया) के दिन मुनि आदिनाथ विहार (भ्रमण) करते हुए हस्तिनापुर पहुंचे। वहां के राजा श्रेयांस व राजा सोम को रात्रि को एक स्वप्र दिखा, जिसमें उन्हें अपने पिछले भव में मुनि को आहार देने की चर्या का स्मरण हो गया।

तत्पश्चात हस्तिनापुर पहुंचे मुनि आदिनाथ को उन्होंने प्रथम आहार ईक्षु रस (गन्ने का रस) का दिया। इसी कारण यह दिन इक्षु तृतीया या अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया है। आज के दिन श्रावक इक्षु रस का दान करते हैं। आप आज के दिन कुछ न कर सकें तो एक काम अवश्य करना, अपने कस्बे में शहर में या अपनी सामर्थ्य अनुसार जहां पर भी मुनि हो, उन्हें आहार अवश्य करवा देना।

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