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महोत्सव : संसार परिभ्रमण का अंत कराता है कैवल्य ज्ञान


सारांश

ज्ञानतीर्थ में रविवार को पंचकल्याणक महोत्सव में कैवल्य ज्ञान महोत्सव आयोजित हुआ। केवलज्ञान कल्याणक उसी आत्मा का शुद्ध स्वरूप का द्योतक है, जो अपनी आत्मा में लीन हो गया, बाहरी विषयों से दूर हो गया हो। पढ़िए अजय जैन की रिपोर्ट 


मुरैना। समाधिस्थ संत आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की तपोस्थली मुरैना के ज्ञानतीर्थ में रविवार को पंचकल्याणक महोत्सव में कैवल्य ज्ञान महोत्सव आयोजित हुआ। संसार की भीड़ और आपाधापी के बीच हम पंचकल्याणक के महत्व को गौर से नहीं समझ पाते और तामझाम में ही उलझे रहते हैं। इस संसार मे भव्य आत्मा को जब कैवल्य ज्ञान प्राप्त होता है, तो वह संसारी आत्मा के परिभ्रमण का अंत और शुद्ध आत्मिक स्वरूप के पावन बसंत की तरह होता है। भव्य आत्मा चारों घातिया कर्मों का नाश कर अरिहंत अवस्था को प्राप्त करती हैं।

अरिहंत भगवान के लिए कुबेर द्वारा समवशरण की रचना की जाती है। समवशरण में भगवान की दिव्य ध्वनि खिरती है। गणधर परमेष्ठी उस दिव्य वाणी को झेलते हैं और वह वाणी 18 भाषाओं और सात सौ लघु भाषाओं का रूप होती है। अरिहंत भगवान की दिव्य ध्वनि मोह रहित, निष्पक्ष वीतरागमय होती है। केवलज्ञान कल्याणक उसी आत्मा का शुद्ध स्वरूप का द्योतक है, जो अपनी आत्मा में लीन हो गया, बाहरी विषयों से दूर हो गया, वहीं व्यक्ति केवलज्ञानी हो जाता है। राग द्वेष से रहित वीतराग परिणीति से जीवन व्यतीत करने वाला ही केवलज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है।

जिस भाव में जीव संयम एवं साधना के पथ पर चलते हुए संसार शरीर और भूत भविष्य से अपना मोह त्याग देता है, तब तप कल्याण के बाद वह जीव कैवल्य ज्ञान से युक्त होकर संसार को सच्चे सुख का मार्ग बताता है। कैवल्य ज्ञान ऐसा श्रेष्ठ ज्ञान है जिसको पाने के बाद जीव के ज्ञान में संसार के किसी भी प्राणी का भूत भविष्य वर्तमान आदि साफ-साफ दिखता है और वह संसार सहित तीनों लोको की जानकारी भी अपने ज्ञान में प्राप्त करता है। यह भव्य आत्मा अतेन्द्रीय सुख का अनुभव करती है। यह एक ऐसी दशा है, जो उस जीव को विशेष बनाती है और उसे भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

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