
श्रीफल जैन न्यूज संवाददाता- सम्मेद शिखर पर आया ये संकट तो टल ही जाएगा । लेकिन भविष्य के लिए कई सवाल खड़े हो रहे हैं । सम्मेद शिखर जैसे तीर्थ का भविष्य क्या देखते हैं ?
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज – जैन समाज हमेशा देश की चिंताओं को दूर करता आया है । व्यापार के साथ-साथ हमारे सामाजिक सरोकारों का देश को फायदा मिला है । सम्मेद शिखर पर पर्यटन होना या न होना अब ये मुद्दा गौण हो गया है ।
क्योंकि अगर कुछ कोशिशें हुई भी थी, तो जैन समाज की ऊर्जा ने इसे “निस्तेज” कर दिया है । लेकिन हमको उन बातों पर लौटना चाहिए जो हमारे तीर्थंकरों ने हमें सिखाया है । सम्मेद शिखर या अन्य सभी ऐसे स्थानों पर हमें “करुणादान” करना चाहिए।
अब उस क्षेत्र में सामाजिक उत्थान की अलख जगानी चाहिए । सम्मेद शिखर को लेकर अगर वहां का समाज, वहां की सरकारें, हमारी भावनाओं को समझकर अपनी गतिविधियां रोक रही हैं, तो जैन समुदाय को भी उनका ध्यान रखने के लिए हाथ आगे बढ़ाना चाहिए ।
वहां के आदिवासी व स्थानीय लोगों को हम अकेला नहीं छोड़ सकते । अगर बदलते दौर में सम्मेद शिखर में विकास की जरूरत है तो वहां पर्यावरण से जुड़ी गतिविधियों का विकास कीजिए । मैं तो कहता हूं कि जैन समाज ही वहां बड़े पैमाने पर औषधीय पौधे लगाए ।
वहां के लोगों को जैन समाज की पूजा पद्धति से जुड़ी सामग्रियों के उत्पादन से जोड़ना चाहिए । नारियल, चावल , धोती जैसे कई पदार्थ पूजा में उपयोग में आते हैं । वहां के स्थानीय निवासियों को हथकरघा व अन्य ट्रेनिंग देकर वहां कुटीर उद्योगों की चेन खड़ी करनी चाहिए ।
पर्यावरण और विकास एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं । सम्मेद शिखर क्षेत्र के आस-पास उद्यमिता और आध्यात्मिकता को साथ-साथ चलाया जा सकता है ।
मैं जैन समाज से ये अपील करना चाहता हूं कि वो ऐसे काम करें जिससे सम्मेद शिखर के आस-पास बसने वाले गांवों में रोजगार की चिंता खत्म हो । अगर ऐसा हो गया तो ये अपने आप में अनुपम उदाहरण होगा ।
श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता – ये तो अच्छी बात है लेकिन रोजगार से आजीविका बढ़ेगी । वहां धर्म कैसे फलेगा ?
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज – जैन समुदाय आजीविका और आध्यात्मिकता दोनों के लिए जाना जाता है । मेरा निजी मत है कि सम्मेद शिखर के आस-पास सरकार और जैन समाज को पूरे जैन मय माहौल बनाना चाहिए ।
देश-विदेश के लोग वहां आएं, तीर्थंकरों और जैन संस्कृति व पंरपराओं को उसी परिवेश में ढ़ल कर देखें । एक और बात है जैनों के दुनिया भर के संगठन हो गए हैं । सम्मेद शिखर आंदोलन में देख लो । पता नहीं , किसने आंदोलन का कॉल दिया, कौन बंद करवा रहा है ।
कौन बाइक पर रैली निकाल रहा है । भावनाएं सभी की एक सी थी, लेकिन केन्द्रीकृत व्यवस्था नहीं थी । जैन समाज में केन्द्रीकृत व्यवस्था बनाने का समय आ गया है । हमनें गिरनार जी में देखा, अन्य स्थानों पर देखा कि एक-एक मुद्दे और एक-एक जगह पर जैनियों को कितना संघर्ष करना पड़ा है ।
ऐसा हर बार करना क्यों जरूरी है । देश भर के जैन समुदाय के लोगों की एक सेंट्रल इकाई हो जो सारे जैन धर्म स्थलों पर शांति व पवित्रता बनाए रखने के लिए अलग-अलग सरकारों से समन्वय करें, संवाद करे ।
सरकारों को ही नहीं पता कि जैन धर्म पर अगर बात करनी हैं तो किससे करें ? परसनाथ क्षेत्र में जैन स्टडी सेंटर जैसे संस्थान बनें । जिसमें व्यावसायिक शिक्षा नहीं बल्कि आध्यात्मिक शिक्षा मिलें । डिग्री नहीं, अनुभव मिले ।
श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता – जैन ही नहीं हर धर्म में ये समस्या हैं । सभी धर्म में लोगों को लगता है कि उनके स्थानों का परिवेश बदला जा रहा है । क्या होना चाहिए ?
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज – देश में आधुनिकता बढ़ रही है । ये समस्या तो हर धर्म के सामने आएगी । जनसंख्या बढ़ रही है, रोजगार के साधन घट रहे हैं । तीर्थ स्थानों पर अनावश्यक भीड़ बढ़ रही है । केदारनाथ,बद्रीनाथ हादसों में हमने देखा कितना नुकसान हुआ वहां ।
सरकार को चाहिेए कि देशव्यापी धार्मिक पर्यटन के लिए अलग से मंत्रालय खोले । जिसमें तीर्थ स्थान से जुडी़ मान्यताएं ,वहां बनी संचालन समितियां और राज्य व केन्द्र सरकारें मिलकर तय करें कि आने वाले दौर में तीर्थ स्थलों का स्वरूप क्या होना चाहिए ।
एक पर्यटक के रूप में आप भी चाहेंगे कि विभिन्नता को महसूस करें । आप पुष्कर जाएं, केदारनाथ जाएँ, सम्मेद शिखर जाएं । अगर सभी जगह पिज्जा,केक की दुकानें खुल जाएंगी । मांस-मदिरा मिलने लगेगा तो फिर तीर्थ स्थान जाने की जरूरत ही क्या है ।
आध्यात्मिकता महसूस न हो तो वो स्थान तीर्थ स्थान नहीं रह जाता । कुछ और ही हो जाता है ।












