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सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक: दिगंबर जैन जिनालयों में धूमधाम से मनाए जाएंगे कल्याणक


जैनधर्म के सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान का 18 फरवरी को ज्ञान और 19 फरवरी को मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा। फाल्गुन कृष्ण छटवीं को भगवान को केवल्य ज्ञान हुआ और सप्तमी तिथि को उन्होंने मोक्ष भी पाया। यह अद्भुत संयोग बहुत पुण्यकारी है। भगवान सुपार्श्वनाथ भगवान के ज्ञान और मोक्ष कल्याणक के साथ एक और संयोग आ रहा है। वह है भगवान चंद्रप्रभु का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 19 फरवरी फाल्गुन कृष्ण सप्तमी पर है। इस अवसर पर जिनालयों में विशेष महामस्ताभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण लाडू आदि विधान पूर्ण मनोयोग से किए जाएंगे। श्री फल जैन न्यूज की इस श्रंखला में आज उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति पढ़िए…


इंदौर। सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी अवसर्पिणी काल के दुरूषमा-सुषमा चौथे काल में उत्पन्न हुए थे। जंबूदीप के भरत क्षेत्र में वाराणसी नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ की रानी पृथिवीषेणा के गर्भ में ये भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्र में स्वर्ग से अवतरित हुए थे। इनका जन्म ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन अग्निमित्र नामक शुभ योग में हुआ था। इनका यह नाम जन्माभिषेक करने के बाद इंद्र ने रखा था। इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था। इनकी आयु बीस लाख पूर्व वर्ष की थी। शरीर दो सौ धनुष ऊँचा था। इन्होंने कुमार काल के पांच लाख वर्ष बीत जाने पर धन का त्याग (दान) करने के लिए साम्राज्य स्वीकार किया था। इनके निरूस्वेदत्व आदि आठ अतिशय तथा पद्मपुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार दश अतिशय प्रकट हुए थे। इनकी आयु अनपवर्त्य थी। वर्ण प्रियंगु पुष्प के समान था।

सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे हुआ केवल ज्ञान

बीस पूर्वांग कम एक लाख पूर्व की आयु शेष रहने पर इन्हें वैराग्य हुआ। ये मनोगति नामक शिविका पर आरूढ़ होकर सहेतुक वन गए तथा वहां इन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन सायं बेला में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। संयमी होते ही इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया था। ये छद्मस्थ अवस्था में नौ वर्ष तक मौन रहे। सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकाल के समय इन्हें केवलज्ञान हुआ था।

संघ में यह थे भगवान के

इनके चतुर्विध संघ में 95 गणधर, 2 हजार 30 पूर्वधारी, 2 लाख 44 हजार 920 शिक्षक, 9 हजार अवधिज्ञानी, 11 हजार केवलज्ञानी, 15 हजार 3 सौ विक्रिया ऋद्धिधारी, 9 हजार 150 मनरूपर्ययज्ञानी, 8 हजार 600 वादी थे। इस प्रकार कुल 3 लाख मुनि, 3 लाख 30 हजार आर्यिकाएं, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएं असंख्य न देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच थे।

सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में मोक्ष हुआ

विहार करते हुए आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर आए। यहां एक हजार मुनियों के साथ इन्होंने प्रतिमा योग धारण कर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में सूर्याेदय के समय मोक्ष प्राप्त किया था । दूसरे पूर्वभव में ये धातकीखंड के पूर्व विदेह क्षेत्र में सुकच्छ देश के क्षेमपुर नगर के नंदिषेण नामक नृप थे। प्रथम पूर्वभव में मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमान में अहमिंद्र रहे।

जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु भगवान का परिचय

इस मध्य लोक के पुष्कर द्वीप में पूर्व मेरू के पश्चिम की ओर विदेह क्षेत्र में सीतोदा नदी के उत्तर तट पर एक ‘सुगंधि नाम का देश है। उस देश के मध्य में श्रीपुर नाम का नगर है। उसमें इंद्र के समान कांति का धारक श्रीषेण राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी धर्मपरायणा श्रीकांता नाम की रानी थी। दंपत्ति पुत्र रहित थे अतरू पुरोहित के उपदेश से पंच वर्ण के अमूल्य रत्नों से जिन प्रतिमाएं बनवाईं, आठ प्रातिहार्य आदि से विभूषित इन प्रतिमाओं की विधिवत् प्रतिष्ठा करवाई। पुनरू उनके गंधोदक से अपने आपको और रानी को पवित्र किया और आष्टान्हिकी महापूजा विधि की। कुछ दिन बाद् रानी ने उत्तम स्वप्नपूर्वक गर्भधारण किया। पुनरू नव मास के बाद पुत्र को जन्म दिया। बहुत विशेष उत्सव के साथ उसका नाम ‘श्रीवर्मा’ रखा गया। किसी समय ‘श्रीपद्म’ जिनराज से धर्माेपदेश को ग्रहण कर राजा श्रीषेण पुत्र को राज्य देकर दीक्षित हो गया। एक समय राजा श्रीवर्मा भी आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन जिनपूजा महोत्सव करके अपने परिवारजनों के साथ महल की छत पर बैठा था कि आकस्मिक उल्कापात देखकर विरक्त होकर श्रीप्रभ जिनेंद्र के समीप दीक्षा लेकर श्रीप्रभ पर्वत पर सन्यास मरण करके प्रथम स्वर्ग में श्रीप्रभ विमान में श्रीधर नाम का देव हो गया। धातकी खंड द्वीप की पूर्व दिशा में जो इष्वाकार पर्वत है। उसके दक्षिण की ओर भरतक्षेत्र में एक पूर्व धातकीखंड द्वीप में सीता नदी के दाहिने तट पर एक मंगलावती नाम का देश है। इसके रत्न संचय नगर में कनकप्रभ राजा राज्य करते थे। उनकी कनकमाला रानी थी। वह अच्युतेन्द्र वहां से आकर इन दोनों के पद्मनाभ नाम का पुण्यशाली पुत्र हुआ। किसी समय पद्मनाभ राजा श्रीधर मुनि के समीप धर्माेपदेश श्रवण कर दीक्षित हो गए। सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन कर ग्यारह अंग में पारंगत होकर सिंह निरूक्रीडित आदि कठिन-कठिन तप करने लगे। तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आयु के अंत में विधिवत् मरण करके वैजयंत विमान में अहमिंद्र हो गए। इनके श्रीवर्मा, श्रीधरदेव, अजितसेन चक्रवर्ती, अच्युतेन्द्र, पद्मनाभ, अहमिन्द्र, चंद्रप्रभ भगवान ये सात भव प्रसिद्ध हैं।

गर्भ और जन्म कल्याणक

जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु के गर्भ और जन्म कल्याणक के बारे में पुराणों में वर्णित है कि अनंतर जब इनकी छह माह की आयु बाकी रह गई, तब जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंद्रपुर नगर के महासेन राजा की लक्ष्मणा महादेवी के यहां रत्नों की वर्षा होने लगी। चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन गर्भ कल्याणक महोत्सव हुआ एवं पौष कृष्ण एकादशी के दिन भगवान चंद्रप्रभ का जन्म हुआ।

भगवान चंद्रप्रभु का तप कल्याणक 

किसी समय दर्पण में अपना मुख देख रहे थे कि भोगों से विरक्त होकर देवों द्वारा लाई गई ‘विमला’ नाम की पालकी पर बैठकर सर्वर्तुक वन में गए। वहां पौष कृष्ण एकादशी के दिन हजार राजाओं के साथ दीक्षा ले ली। पारणा के दिन नलिन नामक नगर में सोमदत्त के यहां आहार हुआ था।

केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणक 

तीन माह का छद्मस्थ काल व्यतीत कर भगवान दीक्षावन में नागवृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवल ज्ञान को प्राप्त हो गये। ये चंद्रप्रभ भगवान समस्त आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रवृत्ति करते हुए सम्मेदशिखर पर पहुंचे। एक माह तक प्रतिमा योग से स्थित होकर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन ज्येष्ठा नक्षत्र में सायंकाल के समय शुक्लध्यान के द्वारा सर्वकर्म को नष्ट कर सिद्धपद को प्राप्त हुए।

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