पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का विहार विदिशा से सागर की ओर चल रहा है। इसी दौरान उन्हीं के शिष्य मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने अपने प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने इसमें कहा कि मन हल्का रखो, जीवन गहरा जिओ। सागर से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
सागर। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का विहार विदिशा से सागर की ओर चल रहा है। उन्हीं के शिष्य मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने अपने प्रवचन में कहा कि मन हल्का रखो, जीवन गहरा जिओ। मन में इतना कुछ भर के जिओगे तो मन भर के कैसे जिओगे ? उन्होंने कहा कि हमारा मन एक बर्तन की तरह है। जब हम इसमें हर दिन की चिंता, बीते कल की शिकायतें, और आने वाले कल का डर भरते जाते हैं तो इसमें आनंद, प्रेम और शांति के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। मुनिश्री ने कहा कि कभी आपने देखा है, बच्चों के चेहरे पर कितना सच्चा सुख होता है? क्योंकि, उनका मन खाली होता है न कोई शिकवा, न कोई फिक्र। और हम? हम हर बात को मन में संजोकर रखते हैं, किसी की कही बात, किसी की बुराई, अपने डर, अपनी तुलना और यही बोझ हमें भीतर से थका देता है।
जीवन को सही मायनों में जीना है तो मन को हल्का करना होगा। माफ़ करना सीखिए, छोड़ना सीखिए, और क्षण को अपनाना सीखिए। मुनिश्री ने कहा कि जब तक हम पुराने दुखों से चिपके रहेंगे, नए सुख हमारी ओर नहीं आएँगे। जैसे बन्द मुठ्ठी में कुछ नया नहीं पकड़ा जा सकता, वैसे ही भरे हुए मन में नई खुशी नहीं समा सकती। इसलिए हर दिन थोड़ा सा मन खाली करो। अनावश्यक विचारों का बोझ उतार दो और देखो, जीवन अपने आप ‘मन भर’ कर जीने लायक हो जाएगा। मन को मुक्त करो, वही सच्चा सुख है।













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