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कविता काष्ठरथ: प्रतीके सौहार्द्र: शांति-सद्भाव के लिए रथोत्सव पर भावपूर्ण कविता


पर्युषण पर्व के समापन पर प्रतिवर्ष निकाले जाने वाले रथोत्सव पर भावपूर्ण और अहिंसा, शांति, विश्व बंधुत्व, भातृत्व भाव, संयम, त्याग, तप, तपस्या आदि धर्म का पालन करते हुए सकल विश्व के मंगल स्वास्थ्य की कामना करते हुए। अजीत कोठिया ने बेहतरीन कविता प्रस्तुत की है। आप भी पढ़िए….  


मैं काष्ठ रथ हर वर्ष पर्युषण समापन पर निकाला जाता।

मैं प्रतीक सुख समृद्धि का,

जन जन की आशाओं का,

सौभाग्य सूचक

प्रतीक शांति और सौहार्द्र का।

देता दश धर्माें का संदेश,

मेरे आगमन पर लौटते घर सभी,

लोग चाहे वो हांे देश या विदेश।

मैं राष्ट्र और जैनों की

सांस्कृतिक धरोहर।

देखने मुझे जुटता लोगों का हजूम

पर मुझे पसंद है अहिंसा,

शांति और भाईचारा,

जो देश में अब थोड़ा घट रहा,

फिर भी निकलता हूं हर साल,

आश्विन मास की दूज को,

अहिंसा की शान बढ़ाने,

विश्व शांति का गौरव बढ़ाने

भले मेरे आने से होता हो

जनता जनार्दन का मनोरंजन

पर खुशी हैं मुझे इस बात की

मै दंगे नहीं कराता,

हर पंथ, धर्म, संप्रदाय को मिलाता

क्योंकि मज़हब नहीं सिखाता

आपस में बैर रखना

आओ रथोत्सव मेले में

ले लो सुख समृद्धि की आशीषे

सर्वे भवंतु सुखिन

सर्वे संतु निरामया

यही दुआ है मेरी रथोत्सव 25 पर

आओ मांगे क्षमा एक दूजे से,

करे क्षमा सबको

मिच्छामी दुक्कडम अपनाएं

उत्तम क्षमा को विश्वव्यापी बना

भारत को पुनः विश्व गुरु बनाएं।

-अजीत कोठिया डडूका

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