प्रियंका संजय सेठी की प्रस्तुति श्रीफल कथा सागर में अलग -अलग विषयों पर पढ़े धार्मिक कहानियां प्रत्येक रविवार को सिर्फ http://www.shreephaljainnews.com पर।
वर्तमान समय भागदौड़ और आपा खो देने वाला समय है;परिवार में पति-पत्नी के बीच मतभेद, मनभेद बढ़ जाते हैं तो न जाने कितने नकारात्मक विचार मन में आकार लेने लगते हैं। पद्मपुराण के पर्व 99 में वर्णित सीता की कथा से शिक्षा लेनी चाहिए कि विचारों में नकारात्मकता नहीं आए।
सेनापति कृतान्तवक्त्र, जब सीता को जंगल में छोड़कर वापस राम के पास आता है, तो वह राम से कहता है कि सीता देवी ने आपसे कहा है कि यदि अपना हित चाहते हो तो जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है, उस तरह से जिनेन्द्र देव की भक्ति नहीं छोड़ना।
स्नेह तथा अनुराग से युक्त जो राजा मुझे छोड़ सकता है, निश्चय ही वह जिनेन्द्र देव में आस्था भी छोड़ सकता है। सीता का कहना था कि वचनबल को धारण करने वाला दुष्ट मनुष्य बिना विचारे किसीके भी विषय में चाहे जो निन्दा की बात कह देता है परन्तु बुद्धिमान मनुष्य को तो विचार करना चाहिए।
दूसरे के कहने से जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है, उस प्रकार सधर्म रूपी रत्न को नहीं छोड़ना क्योंकि मेरी अपेक्षा सधर्म रूपी रत्न की निन्दा करने वाले अधिक हैं। हे राम, आपने मुझे भयंकर निर्जन वन में छोड़ दिया है परन्तु इस तरह आप सम्यग्दर्शन की शुद्धता को मत छोड़िएगा।
मेरे साथ वियोग से आपको इस भव में दुःख होगा परन्तु सम्यग्दर्शन के छूट जाने पर तो भव-भव में दुःख होगा। संसार में मनुष्य को खजाना, स्त्री तथा वाहन आदि मिलना सुलभ है परन्तु सम्यग्दर्शन रूपी रत्न साम्राज्य से भी कहीं अधिक दुर्लभ है।
इस प्रकार स्नेहपूर्ण चित्त को धारण करने वाली सीता ने जो संदेश दिया है उस पर मनन करना आवश्यक है। इस कथा से यही शिक्षा लेनी चाहिए कि नकारात्मक विचारों से मन में क्लेश का भाव उत्पन्न होता है जिस कारण व्यक्ति जिनेन्द्र देव की भक्ति से भी दूर होता जाता है।
कभी भी ऐसा भाव मन में नहीं लाएं जिससे सम्यग्दर्शन रूपी रत्न मिलने में रुकावट आए।
(अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज की डायरी )











