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आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा : जन्म की खुशी मनाते हैं, मृत्यु की कोई खुशी नहीं मनाता है जबकि संयमी व्यक्ति संलेखना धारण करता है और उनकी समाधि होने पर मृत्यु महोत्सव मनाते हैं….


शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आप डॉक्टर के पास जाते हैं किंतु आध्यात्मिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए गुरु चरण में आना होगा – आचार्य वर्धमान सागर महाराज

: साबला कस्बे में अजित कीर्ति गिरी ट्रस्ट द्वारा आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा एवं भव्य स्मारक प्रतिष्ठा महाेत्सव

: महाेत्सव में इसमें मुंबई, पारसोला, धरियावाद, गामडी निठाउवा, रीछा, मुंगेड, सागवाड़ा, बांसवाड़ा के लोगों ने लिया भाग ।


साबला। कस्बे में अजित कीर्ति गिरी ट्रस्ट द्वारा आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा एवं भव्य स्मारक प्रतिष्ठा महाेत्सव हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। प्रातः श्री जी का पंचामृत अभिषेक के बाद महामंडल की पूजा हुई। आचार्य श्री के प्रवचन एवं संघ की आहार चर्या , सामायिक के बाद दोपहर को विमान शुद्धि जुलूस, वेदी संस्कार, वास्तु पूजन एवं हवन पुण्यार्जक साैधर्म इंद्र एवं अन्य इंद्र परिवार की तरफ से की गई।

इस अवसर पर आचार्य श्री अजित सागर जी की गृहस्थ अवस्था के नगर से सैकड़ो परिजन एवं समाज जन शामिल हुए। साबला समाज ने उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया। रात काे नाटक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। इसमें बच्चों एवं महिलाओं ने वेशभूषा पहनकर सांस्कृतिक कार्यक्रम किए। इंदौर से पंडित सुरेश मरोरा एवं प्रदेश भर से लाेग उपस्थित हुए। इसमें मुंबई, पारसोला, धरियावाद, गामडी निठाउवा, रीछा, मुंगेड, सागवाड़ा, बांसवाड़ा के लोगों ने भाग लिया

वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि संसारी प्राणी संसार में राग द्धेष के कारण परिभ्रमण कर रहा है। इस कारण कर्मों का आश्रव होता है और कर्म का बंधन होता है। यद्यपि आत्मा अजर अमर है जन्म लेना आसान है जन्म सभी का होता है किंतु जन्म का महत्व सार्थकता को समझना जरूरी है। आप सभी लोग रोग का इलाज चिकित्सक से कराते हैं । जन्म, जरा, मरण रूपी रोग की औषधि रत्नत्रय रूपी सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आप डॉक्टर के पास जाते हैं किंतु आध्यात्मिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए गुरु चरण में आना होगा। आज श्रावक और महिलाएं श्रावक धर्म भूल रहे हैं यह भूल रहे हैं कि हम किस कुल में जन्मे हैं। अरिहंत हमारे भगवान है। देव शास्त्र गुरु के समक्ष कैसे दर्शन करना चाहिए, भक्ति करना चाहिए क्योंकि गुरुओं के आशीर्वाद से पुण्य का अर्जन होता है। गुरुओं, देव स्थानों पर मर्यादित कपड़े पहनना चाहिए।

महाराज ने कहा कि जन्म सभी लेते हैं जन्म की खुशी मनाते हैं मृत्यु की कोई खुशी नहीं मनाता है ,जबकि संयमी व्यक्ति संलेखना धारण करता है और उनकी समाधि होने पर मृत्यु महोत्सव मनाते हैं। आचार्य श्री ने बताया कि सभी को मरण सुधारना जरूरी है, घर से आड़े होकर नहीं, खड़े होकर निकलना चाहिए। आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज प्रवचन में कहते थे कि व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह अर्थी के रूप में आड़ा होकर निकलता है, जबकि दीक्षा लेने वाला श्रावक खड़े-खड़े घर से बाहर निकलता है। जीवन में संयम की साधना में परिवार, धन के प्रति मोह, आसक्ति मनुष्य जीवन में बाधक होती है इसलिए संलेखना को धारण कर आध्यात्मिक उन्नति करके जीवन की चरम सीमा को प्राप्त करना चाहिए। जीवन की चरम सीमा अर्थात संसार परिभ्रमण से छुटकारा पाना होता है।

आचार वर्धमान सागर जी महाराज ने समाधिस्थ आचार्य श्री अजित सागर जी के जीवन के अनेक संस्मरण भाव विभोर होकर सुनाएं। संहिता सूरी पंडित हंसमुख शास्त्री अनुसार आचार्य श्री अजित सागर जी ने समाधि के पूर्व बसंत पंचमी 31 जनवरी 1990 को मुनि वर्धमान सागर जी को परंपरा का पंचम पट्टाधीश का लिखित आदेश संघ और समाज को दिया।

आचार्य श्री अजित सागर जी की समाधि वैशाख शुक्ला पूर्णिमा सन 1990 को साबला में हुई। इस पुण्य स्मृति स्वरूप साबला में श्री दिगंबर जैन अजित कीर्ति गिरी ट्रस्ट द्वारा आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा एवं भव्य स्मारक प्रतिष्ठा का 3 दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस माैके पर गुरु भक्त युवा फेडरेशन अध्यक्ष सचिन, उपाध्यक्ष कौशिक जैन, निलेश पंचोरी, गजेन्द्र वेडा, दीपक पारीख, नागेन्द्र पारीख, भावेश वेडा, अनिल वेडा, खुशपाल पचोरी, दिलीप वेडा, सुधीर मुंगेड, रतनपाल पचोरी आदि कई भारी संख्या में महिला पुरुष मौजूद रहे।

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