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दक्षिण भारत में जैन दर्शन आज भी जीवित : एक जीवंत सत्य जो पर्वतों, मंदिरों, शिलालेखों और श्रद्धालुओं के हृदयों में है स्पंदित 


आधुनिकता की तेज़ दौड़ में जहां अनेक प्राचीन परंपराएँ धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हैं, वहीं दक्षिण भारत की पवित्र धरती आज भी जैन दर्शन की अमर गाथा सुनाती दिखाई देती है। तमिलनाडु के जिंजी स्थित तिरुनाथर कुंद्रु की यह शिला केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जीवित जैन संस्कृति, साधना और अध्यात्म की मौन साक्षी है। मुरैना से मनोज जैन नायक की प्रस्तुति में आज पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री का आलेख…


मुरैना/सांगानेर। आधुनिकता की तेज़ दौड़ में जहां अनेक प्राचीन परंपराएँ धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हैं, वहीं दक्षिण भारत की पवित्र धरती आज भी जैन दर्शन की अमर गाथा सुनाती दिखाई देती है। तमिलनाडु के जिंजी स्थित तिरुनाथर कुंद्रु की यह शिला केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जीवित जैन संस्कृति, साधना और अध्यात्म की मौन साक्षी है।

इन चट्टानों पर उकेरी गई तीर्थंकर प्रतिमाएँ यह बताती हैं कि दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रभाव कितना व्यापक और गहरा रहा है। समय बदला, राजवंश बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण का संदेश इन शिलाओं में आज भी उतनी ही दृढ़ता से अंकित है जितना सदियों पहले था।

जब कोई साधक या पर्यटक तिरुनाथर कुंद्रु की पहाड़ियों पर पहुँचता है, तो उसे केवल पत्थरों की नक्काशी नहीं दिखाई देती, बल्कि उन तपस्वी मुनियों की तपश्चर्या का अनुभव होता है जिन्होंने इन पर्वतों को अपनी साधना का केंद्र बनाया। ऐसा प्रतीत होता है मानो ये शिलाएँ आज भी कह रही हों-सत्य और अहिंसा कभी नष्ट नहीं होते, वे युगों-युगों तक जीवित रहते हैं।

दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्र- श्रवणबेलगोला, मूडबिद्री, कार्कल, मेलसिथामूर और तिरुनाथर कुंद्रु में जैन धर्म की विरासत आज भी सुरक्षित है। यह केवल पुरातत्व नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति है, जहाँ आज भी स्वाध्याय, पूजा, तप और धर्म प्रभावना निरंतर चल रही है।

तिरुनाथर कुंद्रु की यह शिला हमें स्मरण कराती है कि जैन दर्शन केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है; वह पर्वतों की चट्टानों पर, मंदिरों की प्रतिमाओं में, साधकों के जीवन में और श्रद्धालुओं की आस्था में आज भी जीवित है।

इस आध्यात्मिक यात्रा और जैन संस्कृति के प्रचार-प्रसार के कार्य में मुझे अनेक समाजसेवियों का स्नेह, मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त हुआ है। विशेष रूप से अरविंद जैन (जैन एकता संगठन) का निरंतर प्रोत्साहन तथा मेखला जैन (स्टेट सेक्रेटी बीजेपी) का सहयोग इस अभियान को नई ऊर्जा प्रदान करता रहा है। समाज और संस्कृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता निश्चित रूप से प्रेरणादायी है।

वास्तव में, दक्षिण भारत में जैन दर्शन केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्य है, जो आज भी पर्वतों, मंदिरों, शिलालेखों और श्रद्धालुओं के हृदयों में स्पंदित हो रहा है।

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