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इंदौर जैन समाज के सामने बड़ा सवाल—अब उत्सव नहीं, विकास का समय : मंदिरों से आगे बढ़कर शिक्षा, संस्कार और स्थायी निर्माण की ओर समाज को लेना होगा निर्णायक कदम


इंदौर दिगम्बर जैन समाज के सामने अब आत्ममंथन का समय है। केवल आयोजन नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार और स्थायी विकास के लिए ठोस संकल्प जरूरी हैं। समाज को एकजुट होकर भविष्य निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना होगा।श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन की समाज के नाम एक पाती….


इंदौर। जय जिनेन्द्र… आज इंदौर दिगम्बर जैन समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सिर्फ उत्सव और आयोजन ही काफी नहीं हैं, बल्कि अब गंभीर सोच और आत्ममंथन की जरूरत है। सवाल यह नहीं कि हमने अब तक क्या किया, बल्कि यह है कि अब आगे हमें क्या करना है।

 क्या अब दिशा बदलने का समय है?

समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हमें और नए मंदिर बनाने चाहिए, या फिर अब अपने घरों को ही गृह चैत्यालय बनाकर धर्म को जीवन में उतारना चाहिए।

 दान का सही उपयोग जरूरी

समाज के बड़े दानदाता और उद्योगपतियों को भी अब यह सोचने की जरूरत है कि उनका योगदान केवल दिखावे तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के स्थायी विकास—जैसे शिक्षा, संस्कार और संरचना निर्माण में लगे।

 एकता में ही शक्ति

पूज्य साधु-संतों के इंदौर आगमन पर सभी कार्यक्रम एकजुट होकर, एक ही बैनर के नीचे आयोजित हों—यह समय की सबसे बड़ी मांग है। अलग-अलग आयोजन नहीं, बल्कि एकता का संदेश समाज को मजबूत बना सकता है।

 विकास के लिए जरूरी संकल्प

अब समाज को कुछ ठोस निर्णय लेने होंगे, जैसे—

गोम्मटगिरी की सुरक्षा और सुनियोजित विकास

मुनियों के लिए सम्मानजनक समाधि स्थल हेतु भूमि

आहार-विहार के लिए चलित व्यवस्था (वाहन)

बच्चों के लिए उच्च स्तरीय लाइब्रेरी और अध्ययन केंद्र

सबसे बड़ा सवाल—बच्चों का भविष्य

आज यह सोचने की जरूरत है कि आखिर क्यों हमारे बच्चों को शिक्षा और संस्कार के लिए बाहर जाना पड़ता है? क्या हम उन्हें अपने ही समाज में बेहतर अवसर नहीं दे सकते?

 आत्ममंथन जरूरी है

अगर इन सवालों से हमें पीड़ा नहीं होती, तो यह हमारी संवेदनहीनता है। समाज की स्थिति तब कमजोर होती है जब जरूरत के समय हम चुप रहते हैं और बाद में एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं।

 अब भविष्य बनाने का समय

इंदौर जैन समाज ने हमेशा बड़े आयोजन किए हैं और इतिहास बनाया है, लेकिन अब समय इतिहास दोहराने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने का है।

एक ही प्रार्थना

जब भी हम मंदिर जाएं, गुरु के पास बैठें या शास्त्र पढ़ें—तो बस यही भाव आए:

“हे प्रभु! हमें शक्ति दें कि हम इन संकल्पों को केवल सोच तक न रखें, बल्कि उन्हें मिलकर पूरा करें।”

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