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जीवन में यदि सम्मान पाना है, तो सच को स्वीकारें: धर्मावलंबी सुन रहे मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी की मंगलवाणी 


आचार्य श्री विशुद्धसागर जी सहित 32 पिच्छी यहां विराजित होकर यहां जैन समाज को धर्म और ज्ञान से परिपूरित कर रहे हैं। संतों के नियमित प्रवचन को यहां की धर्मप्रेमी जनता लाभ उठा रही है। मुनिराजों के दर्शन के लिए सकल जैन समाज के लोग भी यहां पहुंचकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। विदिशा से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…


विदिशा। आचार्य श्री विशुद्धसागर जी सहित 32 पिच्छी यहां विराजित होकर यहां जैन समाज को धर्म और ज्ञान से परिपूरित कर रहे हैं। संतों के नियमित प्रवचन को यहां की धर्मप्रेमी जनता लाभ उठा रही है। मुनिराजों के दर्शन के लिए सकल जैन समाज के लोग भी यहां पहुंचकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। शुक्रवार को यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सर्वार्थ सागर महाराज जी ने प्रवचन में कहा कि सत्य की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है, जब उसे अधूरा बताया जाता है। दोगले लोग झूठ नहीं बोलते। वो बस सच का वो हिस्सा बताते हैं, जो उन्हें अच्छा दिखाए। बात वही कहते हैं, जो उनके पक्ष में जाए। मगर याद रखिए अधूरा सच, पूरा झूठ बन जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए केवल अपने अनुकूल सत्य को प्रस्तुत करता है तो वह समाज में भ्रम फैलाता है। ऐसे लोग दूसरों की दृष्टि में भले ही कुछ समय तक ‘सज्जन’ प्रतीत हों लेकिन, अंततः उनका चरित्र और चेहरा सामने आ ही जाता है।

जीवन में यदि सम्मान पाना है, तो सच को पूरा स्वीकार करना सीखिए। न सिर्फ तब जब वह हमारे पक्ष में हो, बल्कि तब भी, जब वह हमारे खिलाफ हो। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं और जो व्यक्ति सत्य के साथ जीता है, वह कभी आत्मग्लानि में नहीं जीता। इसलिए सज्जनों, आइए, हम केवल अपने हित का नहीं सार्वभौमिक सत्य का साथ दें, क्योंकि सत्य ही आत्मा की सबसे पवित्र वाणी है।

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