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तुम जैन हो तो अपना कोई आसाधारण लक्षण बताओ: मुनिश्री सुधासागर जी ने प्रवचन में फैलाया ज्ञान का प्रकाश


मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और ज्ञान से संबंधित उपदेश दे रहे हैं। मुनिश्री कटनी में धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में उनके प्रवचन और अमृत वचन सुनने के लिए जैन समाज के लोग जुट रहे हैं। पढि़ए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर…


कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और ज्ञान से संबंधित उपदेश दिए। उनकी धर्म सभा कटनी में चल रही है। यहां संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि दो प्रकार का ज्ञान होता है। एक वस्तु को जानने के लिए ज्ञान किया जाता है और एक वस्तु के निर्णय होने के बाद ज्ञान होता है। ज्ञान हर जीव को है लेकिन, जानने के लिए उपयोग करता है। क्यों जानना चाहते हो दुनिया को, क्यों जानने चाहते हो अपने पड़ोसी को, क्या लेना-देना है उससे? जितना अपनों को, गुरु को और भगवान को और हद तो वहां है, जहां अपने आप को भी जानने की इच्छा नहीं होती। जितना दुश्मन को जानने की इच्छा रहती है। मैं क्या हूं, ये नहीं सोच रहा है। मैं कहां से आया हूं। कहां जाना है ये सोचने का समय ही नहीं है। 24 घंटे में हमने क्या किया है? ये याद ही नहीं रहता, बस यही सबसे बड़ी भूल हो रही है। जितना हम दुश्मन को जानने में समय दे रहे हैं कि 24 घंटे हमारा दुश्मन क्या कर रहा है, उतना समय कम से कम हम अपने को और अपनों को जानने में दे दें।

शास्त्र पढो तो मनुष्य पुराण पढ़ना, धर्म पुराण नहीं

तुम कौन हो? इतना सा तुम्हे अपनें अनुभव में लाना है, तुम मनुष्य हो, इतना तो सबको अनुभव में आ रहा है ज्ञानी-अज्ञानी सबके अनुभव में आता है। बस अब तुम्हे दूसरा पुराण पढ़ना ही नहीं है, मैं मनुष्य हूँ, मनुष्य की पढ़ाई करो, मनुष्य के जीवन को मैं कैसे सुखी बनाऊँ, कैसे इसमें मनुष्यता आवे और मनुष्य की जिंदगी को कैसे खतरे से बचाऊँ और भविष्य में भी मैं मनुष्य बनता रहूँ। उस संबंध में ही गुरु से पूछना, मैं मनुष्य हूँ, मुझे मनुष्यता सिखाओ। शास्त्र पढो तो मनुष्य पुराण पढ़ना, धर्म पुराण नहीं। मनुष्य बनने के लिए आप पशु को समझो कि पशु के अलावा हम मनुष्य क्यों है? कोई तुम्हें पशु कहे और तुम्हें बुरा लग जाए तो समझना तुम पशु नहीं हो। कोई एक चीज ढूंढो जो मनुष्यों में ही हो सकती है, पशुओं में नहीं। मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जो पशु नहीं कर सकता, बस वो चीज खोजना है। तुम मनुष्य हो कोई आसाधारण लक्षण बताओ।

भारत अपनी संस्कृति को माता कहता है

फिर गुरु तुमसे दूसरा प्रश्न पूछते हैं कि तुम मनुष्य ही हो या कुछ भी हो क्योंकि, मनुष्य तो सारी दुनिया में है, नहीं महाराज मैं मनुष्य हूं लेकिन आर्यखंड का हूँ, मैं भारतीय हूँ। अब तुम अपने अंदर वह गुण बताओ जो केवल भारतीयों में होता है, विदेशियों में नहीं। भारतीय व्यक्ति परमार्थ चाहता है, भारत अपनी संस्कृति को माता कहता है, नारी शब्द और माता शब्द में कितना अंतर है, माता शब्द पूजनीय वंदनीय और श्रद्धा का विषय है, शिक्षक है, गुरु है और नारी क्या ये पापियों से पूछो। वासनाओं से भरा हुआ जीव दुनिया को नारी दृष्टि से देखता है और पवित्रता से भरा हुआ जीव नारी को माता की दृष्टि से देखता है, इस बात को लेकर कहा कि भारत देश किसी से मैचिंग नहीं करता। अगर तुमसे प्रश्न पूछा जाए कि अगला जन्म किस देश में चाहते हो, उत्तर भारत हो तो भारतीय पुराण पढो। तुम भारतीय हो तो भारतीय की आंख ऐसी होती है जो धरती को भी माँ कहता है और पराई नारियों को भी माँ की दृष्टि से देखता है। मेरी आँख अपने से बड़ी को माँ, छोटी हो तो बिटिया और बराबरी की हो तो बहन का रूप देखती है, इसलिए मैं ओरिजनल भारतीय हूँ। ये गुण तुम्हारे अंदर मरते समय तक है तो गारन्टी मैं देता हूँ नियम से अगला जन्म भारत मे ही होगा।

सारा जगत जैन भोजन को जानता है

अब भारतीय में भी कौन हो? जैन हो। यदि जैन हो तो तुम में ऐसा क्या लक्षण है जो दूसरों में नहीं पाया जाता। तुम वह लक्षण लेकर मरना कि जैन कुल में जन्म लेने की यह विशेषता है और जो मेरे में गुण है वह संसार में कहीं नहीं मिल सकता है क्योंकि मैं जैन हूँ तो अगला भव नियम से तुम्हारा जैन में पक्का है, कोई नही टाल सकता है। सब तरफ से पहचानों, जैनियों का घर कैसा होता है, जो लक्षण दूसरों के घरों में नहीं मिलना चाहिए, जैनी कैसा होता है? ये घर जैनियों का है क्योंकि यहां सदा मुनियों का पड़गाहन होता रहता है। 24 घंटे यदि जैन हो तो ऐसा कुछ खाओ जो मात्र जैनी की ही थाली में होता हो। दुनिया में आज तक किसी धर्म के नाम पर भोजन का नाम नहीं रखा गया लेकिन, सारा जगत जैन भोजन को जानता है। तुम्हारा अगला जन्म जैनकुल में होगा, बस खाते समय वही खाना जो जैनी की पहचान हो।

ऐसी वंदना करो जैसे तीर्थक्षेत्र की वंदना कर रहे 

जिनेंद्र भगवान हमारे पूर्वज है तो हमें उनके संबंध में परिचय प्राप्त करना है। मैं जैन हूं क्योंकि, मुझे 24 भगवानों के नाम याद है। जैनियों को 24 तीर्थंकर के नाम तो आना ही चाहिए क्योंकि, हमे अपने बाप का नाम तो याद होना चाहिए और जैनियों का बाप है- जिनंेद्र देव। ऐसे होते हैं हमारे भगवान, ऐसे होते हैं हमारे गुरु इतना बेसिक ज्ञान तो हमें होना ही चाहिए। साल भर में अपने नगर के सारे मंदिरों की ऐसी वंदना करना चाहिए, जैसे तीर्थक्षेत्र की वंदना कर रहे हैं। कायदे से वेदी पर जितने भगवान है उतने नमोस्तु बैठकर होना चाहिए, ये नही कर सकते तो नेत्र नमस्कार कर लो। एक गर्दन से प्रणाम होता है, नेत्र नमस्कार का अर्थ है मूर्ति को देखों और आँख झुका लो।

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