संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के ग्यारहवें दिन 8 नवम्बर को कार्यक्रम की शुरुआत शांतिनाथ महिला मंडल ने संत शिरमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं मुनिपुंगव श्री को नमन करते हुए मंगलाचरण के साथ की। इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि अदृश्य मुझे दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह मुझे देखना नहीं, उसको देखने से हमारा कोई उद्देश्य हल नहीं होता। दृश्यमान को देखकर के हमारे परिणाम आकुल -व्याकुल होते हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट..
आगरा। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के ग्यारहवें दिन 8 नवम्बर को कार्यक्रम की शुरुआत शांतिनाथ महिला मंडल ने संत शिरमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं मुनिपुंगव श्री को नमन करते हुए मंगलाचरण के साथ की। मंगलाचरण के बाद महाराष्ट्र के रहने वाले श्रमण संस्कृति के विद्वान ने अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि गुरु नहीं मिलते तो हम मोक्ष मार्ग पर नहीं चल पाते। ये हमारा सौभाग्य है कि हमें गुरु का सानिध्य प्राप्त हो रहा है। श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के अन्तर्गत गुरु दर्शन को आए गुरुभक्तों ने मुनिश्री को शास्त्र भेंट कर गुरु का आशीर्वाद लिया। इसी बीच गुरुभक्तों ने चित्र अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया।
गलत नहीं होना और सत्य होने में बहुत अंतर
इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि अदृश्य मुझे दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह मुझे देखना नहीं, उसको देखने से हमारा कोई उद्देश्य हल नहीं होता। दृश्यमान को देखकर के हमारे परिणाम आकुल -व्याकुल होते हैं। सामने वाला भी हमारे लिए अच्छा नहीं मानता। धर्म का अनुभव यही अटक रहा है। सब कुछ सही मानते हुए भी जब अनुभव से तौलता हूं तो धर्म बिल्कुल विपरीत नजर आता है। अभव्य भी कह रहा है कि शास्त्र में लिखा हुआ गलत नहीं है लेकिन यह कहा स्वीकार कर पा रहा है कि यही सत्य है। गलत नहीं होना और सत्य होने में बहुत अंतर है। नास्ति और अस्ति में बहुत अंतर है, यह गलत नहीं है। इसलिए सही है ये मत मान लेना, यह सही है इसलिए गलत नही है ये भी मत मान लेना। कई बार गलत चीज सत्य होती है और कई बार सत्य चीज गलत होती है क्योंकि यह स्थितियां बहुत बार गुजरती हैं। इसलिए तत्वार्थ सूत्रकार को लिखना पड़ता सत्य है लेकिन स्वीकार करने लायक नहीं है।
आत्मा का पर्याय है सत्य
उन्होंने कहा कि कितने कार्य हैं जो मुझे करने नहीं चाहिए लेकिन कर रहा हूं, बुद्धि पूर्वक कर रहा हूं क्योंकि उसे कार्य को किए बिना हमारे इष्ट की सिद्ध नहीं हो रही। कभी-कभी इष्ट की सिद्धि के लिए गलत कार्य भी करना पड़ता है, गलत का समर्थन करना पड़ता है। ये संसार की ऐसी विचित्रता है और इसी के परिणाम स्वरूप मन कह देता है गलत तो नहीं कहूंगा लेकिन मैं सत्य स्वीकार नहीं करूंगा। सत्य वो अनुभूत वस्तु है जो आत्मा की पर्याय बन सकती है। ये गलत नहीं, इतने कहने मात्र से जरूरी नहीं है इसने स्वीकार कर लिया। क्या जिनेंद्र भगवान गलत हैं, सदोष हैं, बिल्कुल नहीं निर्दोष हैं इतने कहने मात्र से मत समझ लेना उसने भगवान को स्वीकार कर लिया, इतने मात्र से जरूरी नहीं है कि हमे भगवान मिल गया। हीरा तुम्हारे हाथ में आ सकता है लेकिन तुम्हें मलकियत का अनुभव हो ऐसा कोई नियम नहीं है। बैंक में मैनेजर धन को हाथ से गिनता है लेकिन उसे धनीपने का आनंद नहीं आता। धन है और धनी नहीं है, गुरु है लेकिन शिष्य नहीं है, धर्म है लेकिन वो धर्मी नहीं है, ऐसा कोई नियम नहीं है। भगवान हैं लेकिन भक्त नहीं है क्योंकि वो यह नहीं कह पा रहा है, यही सत्स्वरूप है।
धर्म असीम है
सम्यकदर्शन से पहले की भूमिका जैसे ही तुम्हें कोई अच्छी वस्तु दिखे और तुम्हें देखने का भाव आये, समझ लेना संदेह है, आकर्षण है, शायद मिथ्यादृष्टि हो। तुम और तुम्हें कोई भी चीज देखने का भाव आए मुझे नहीं देखना पूरी जिंदगी देखते ही तो रहा हूं क्या मिला, सब सुन लिया अब कुछ नहीं सुनना। आंख, नाक, कान जिस- जिस इन्द्रिय का हमने सेवन किया, उसी पर हमारी शक्ति क्षीण होती गई। पहले थर्मामीटर है बोरियत, दूसरा थर्मामीटर है अरुचि, कर तो रहे हो लेकिन रुचि नहीं है, तीसरा थर्मामीटर है तुम्हें थकान तो महसूस नहीं हो रही है, विराम का भाव तो नहीं आ रहा है। आप उसे देखिए जिसमें आपकी आंख थके नहीं, वो साधना करो। कोई आज तक दावा कर सके तो बताओ कि मैंने ऐसी चीज देखी है जिसमें मेरी आंख थकती नहीं है बल्कि आंखों की ज्योति और बढ़ती है। कभी हुआ है ऐसा? नही, इसलिए अपन सब कुछ देखते हुए भी सही नहीं देख पा रहे हैं, सही वह है जिसमें आंख थकती नहीं है। एक पाप ऐसा बताओ, जिसको करने के बाद कोई भी व्यक्ति थकता नहीं हो, थकता है, पाप असीम नहीं हो सकता और धर्म वो चीज है जिसमें गैप की जरूरत न पड़े, धर्म असीम है और हमने धर्म को सीमित कर दिया, पाप को असीमित कर दिया। मन्दिर जाने की सीमा है और घर जाने की कोई सीमा नहीं। इस दौरान सभी विद्वान पूरे जगत में धर्म का परचम लहरा रहे हैं। 29 अक्टूबर से शुरू हुए श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवम्बर को होगा। इसके साथ ही श्री दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति आगामी आयोजनों की तैयारियों में जूट गई है।













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