जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का ज्ञान कल्याणक (केवलज्ञान) इस बार 30 दिसंबर को आ रहा है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष आराधना और अन्य धार्मिक विधियों से भक्ति की जाती है। पौष शुक्ल एकादशी को भगवान अजितनाथ जी ने 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद पूर्ण ज्ञान (केवलज्ञान) प्राप्त किया। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की संकलित और संपादित रिपोर्ट…
इंदौर। जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का ज्ञान कल्याणक (केवलज्ञान) इस बार 30 दिसंबर को आ रहा है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष आराधना और अन्य धार्मिक विधियों से भक्ति की जाती है। पौष शुक्ल एकादशी को भगवान अजितनाथ जी ने 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद पूर्ण ज्ञान (केवलज्ञान) प्राप्त किया। यह घटना पौष शुक्ल एकादशी को रोहिणी नक्षत्र में सहेतुक वन में सप्तपर्णी वृक्ष के नीचे घटित हुई थी और भगवान आत्म साक्षात्कार को पहुंचे। इस अवसर पर देवताओं ने एक दिव्य पवित्र समवशरण का निर्माण किया और अजितनाथ ने अपना पहला उपदेश दिया। उनके शिष्यों में 90 गणधर (जिनमें सिंहसेन प्रमुख थे) और लाखों मुनि तथा आर्यिका उपस्थित थे। ज्ञान कल्याणक का महत्व इस बात में है कि इस दिन से अजितनाथ ने जगत को अहिंसा, सत्य और वैराग्य का मार्ग दिखाया और जैन धर्म के पुनर्स्थापना की शुरुआत हुई। यदि आप इस कल्याणक को मनाना चाहते हैं तो पौष शुक्ल एकादशी को शुद्ध शाकाहारी भोजन, पवित्र पाठ और अजितनाथ के उपदेशों का स्मरण करना चाहिए। भगवान अजितनाथ का जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनके पिता राजा जितशत्रु राजा और मां रानी विजया थीं। उनके जन्म से पहले रानी विजया देवी ने चौदह शुभ सपने देखे थे। शकुन शास्त्रियों से सलाह ली गई और उन्होंने बताया कि विजया देवी एक तीर्थंकर को जन्म देंगी। रानी ने माघ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एक बेटे को जन्म दिया और राजा ने नए जन्मे बच्चे का नाम अजित रखा। जब राजा जितशत्रु बूढ़े हो गए तो उन्होंने अजित को बुलाया और उसे गद्दी संभालने के लिए कहा, लेकिन अजितनाथ बचपन से ही स्वभाव से अलग-थलग रहने वाले थे, इसलिए उन्होंने राजा द्वारा दी गई गद्दी को विनम्रता से अस्वीकार कर दिया।
वे अपनी युवावस्था में ही तपस्वी बन गए और ध्यान और तपस्या के लिए दूर-दराज और घने जंगलों में चले गए। उनके व्यक्तित्व और उनकी कठोर साधनाओं की तीव्रता ने चारों ओर शांति का असर डाला। जानवरों के साम्राज्य में शेर और गाय, भेड़िया और हिरण, सांप और नेवले जैसे प्राकृतिक दुश्मन शांति से उनके आस-पास आकर बैठते थे। बारह साल तक गहरी साधना और दूसरी आध्यात्मिक साधनाओं के बाद पौष महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तारीख को उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। देवताओं ने दिव्य मंडप बनाया और भगवान अजितनाथ ने अपने शानदार और आकर्षक प्रवचन दिए। हज़ारों लोगों ने त्याग का रास्ता अपनाया।













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