धर्मसभा में विहसंतसागर जी महाराज ने कहा कि वाणी हमेशा मधुर होनी चाहिए। वाणी में कभी भी कर्कश नहीं होना चाहिए। जैसे बांस की बांसुरी बनाई जाती है तो उसकी आवाज सुनकर जंगल के पशु इकठ्ठे हो जाते हैं, यदि वही बांस लाठी बन जाए तो सब भागने लग जाते हैं। पढ़िए यह रिपोर्ट…
डबरा। आरोग्यमय वर्षायोग समिति द्वारा गणाचार्य 108 श्री विराग सागर जी मुनिराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से किया। इसके बाद मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर जी महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। उसके पश्चात गुरुदेव ने भक्तामर स्तोत्र के तीसवें काव्य में मुनिवर ने कहा कि हे प्रभो ! आपकी स्वर्णमयी काया पर श्वेत सुंदर चंवर ढोरे जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि मेरु पर्वत पर कोई चंद्रकांति सा जल का झरना ऊपर से गिर रहा हो।

हमेशा मीठी वाणी बोलो
दोपहर कालीन स्वाध्याय में बताया कि वाणी की महिमा वाणी अनेक प्रकार की होती है। कोई कठोर होती है, कोई मीठी होती है। व्यापारी लोग जुबान पर व्यापार करते हैं। आचार्य भगवंत कहते हैं कि भट्टे की अग्नि आंखों से दिखती नहीं है, वह अंदर ही अंदर पकती रहती है, उसकी उष्णता बता रही है कि उसका तापमान कितना है। ठीक उसी प्रकार ध्यान रखना, योगियों जिसकी वाणी कठोर है तो समझ जाओ उनके भाव कितने कठोर होंगे। वाणी हमेशा मधुर होनी चाहिए।
वाणी में कभी भी कर्कश नहीं होना चाहिए। जैसे बांस की बांसुरी बनाई जाती है तो उसकी आवाज सुनकर जंगल के पशु इकठ्ठे हो जाते हैं, यदि वही बांस लाठी बन जाए तो सब भागने लग जाते हैं। आचार्य भगवंत कह रहे हैं कि कौआ और कोयल दोनों को निखार लेना, दोनों का वर्ण एक समान है, लेकिन जब कौआ बोलता है तो कांव-कांव और कोयल बोलती है तो कुहू-कुहू करती है। हम किसी का वर्ण देखकर उसके अच्छे-बुरे की पहचान नहीं कर सकते। इसलिए हमें हित, मित, प्रिय वाणी बोलनी चाहिए।
कार्यक्रम में वार्ड पार्षद मीरा राजोरिया एवं कमलेश राजोरिया ने गुरुदेव को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया एवं चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया। इस अवसर पर संजय जैन कल्लू मगरोनी वाले, नीलेश जैन, काली जैन, नीरू जैन, महेंद्र जैन, महावीर जैन, विवेक जैन, रीतेश जैन, राजू जैन, प्रेमचंद जैन कई महिला एवं पुरुष उपस्थित थे।













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