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दो जुलाई को दो दीक्षार्थियों की दी जाएगी जैनेश्वरी दीक्षा : भव्य सिद्धचक्र मंडल विधान का आयोजन 


 मुनि श्री पुण्य सागर जी संघ सहित सिद्ध क्षेत्र सोनागिर में विराजित हैं। आपके सानिध्य में दीक्षार्थी सात प्रतिमा धारी तारादेवी उकावत तथा सुनीता देवी छाबड़ा गुवाहाटी परिवार द्वारा सिद्धचक्र महामंडल विधान आयोजित किया गया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट..


सोनागिर। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल अक्षुण्ण बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजित सागर जी के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री पुण्य सागर जी संघ सहित सिद्ध क्षेत्र सोनागिर में विराजित हैं। आपके सानिध्य में दीक्षार्थी सात प्रतिमा धारी तारादेवी उकावत तथा सुनीता देवी छाबड़ा गुवाहाटी परिवार द्वारा सिद्धचक्र महामंडल विधान आयोजित किया गया। विधान के दौरान 30 जून को 512 अर्घ्य समर्पित किए गए।

समर्पित किए गए अर्घ्य

मुनि श्री पुण्य सागर जी द्वारा तारादेवी उकावत तथा सुनीता देवी छाबड़ा को आगामी 2 जुलाई को जैनेश्वरी दीक्षा दी जाएगी। बाल ब्रह्मचारिणी वीणा दीदी बिगुल अनुसार मुनि श्री ने बताया कि विधान में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठि को अर्घ्य समर्पित किए गए। सिद्ध बनने के पूर्व, अरिहंत साधु परमेष्ठि पुरुषार्थ कर बन सकते हैं। वर्तमान में विदेह क्षेत्र से मोक्ष जा सकते हैं।

नारियल के समान होते हैं आचार्य परमेष्ठी

आचार्य परमेष्ठी का गुणानुवाद करते हुए मुनि श्री पुण्य सागर जी ने बताया कि आचार्य ज्ञान, शिक्षा, दीक्षा देते हैं, अनेक गुण के धारी होते हैं। हित मित्, प्रिय वाणी का उपयोग करते हैं। आचार्य परमेष्ठी नारियल के समान होते हैं, बाहर से कठोर किंतु भीतर से हृदय से नरम होते हैं। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा में वर्तमान में पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी आचार्य शांतिसागर जी की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। उनके सानिध्य में वर्ष 2024 में आचार्य शताब्दी महोत्सव देश भर में मनाया जाएगा। आचार्य श्री शांति सागर जी ने सोनागिर क्षेत्र में भी मुनि दीक्षा दी है। आचार्य श्री शांतिसागर जी ने दक्षिण भारत से उत्तर भारत भ्रमण कर धर्म प्रभावना की। जिन स्थानों पर साधुओं का प्रवेश निषेध था, वहां उन स्थानों पर भी उन्होंने सिंह वृति धारण कर सभी और विहार किया। वर्तमान में साधु चर्या आचार्य शांतिसागर जी की देन है। उन्होंने दीक्षा गुरु को दीक्षा दी इसलिए वह गुरुणा गुरु कहलाते हैं।

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