आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में विराजित रहकर मंगल देशना दी है। इसमें धर्म, ग्रंथ और ज्ञान का महत्व बताया। देव शास्त्र और गुरु की महिमा का बखान किया है। जावद से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
जावद। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित जावद विराजित हैं। शुक्रवार को उपदेश में आचार्यश्री ने बताया कि संसारी प्राणी चार प्रकार की संज्ञाओं से ग्रसित होकर शाश्वत ज्ञान से विमुख है। ज्ञान आत्मा का स्वभाव है ,हमारे अरिहंत सिद्ध भगवान ने कर्मों का नाश कर सिद्ध अवस्था प्राप्त कर अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, अनंत वीर्य आदि गुण प्रगट किए हैं। हमारे श्री आदिनाथ भगवान से लेकर श्री महावीर स्वामी तक सभी 24 तीर्थंकरों ने समवशरण में धर्म देशना दी। जिसे गणधरों ने ग्रहण कर अपनी स्मरण शक्ति से अनेक शास्त्रों की रचना की है, जो जिनवाणी के रूप में हमें प्राप्त हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने जावद की धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि जिन शासन प्रदत्त जैन धर्म में आत्मा को परमात्मा बनाने का मार्ग बताया गया हैं।
जिस प्रकार अंधकार को प्रकाश के माध्यम से दूर किया जाता हैं। उसी प्रकार मोह रूपी अज्ञान धर्म रूपी प्रकाश से दूर करने का देव शास्त्र एवं गुरु मार्ग दिखाते हैं। श्री जिनेंद्र जैन ने बताया कि आचार्य श्री की धर्म देशना के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया कि संसार के दुखों ओर विषय भोगों से विरक्त होकर दीक्षा ली जाती हैं। इससे ज्ञान और शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही निर्वाण का मार्ग है।













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