आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। स्वतंत्र होना अच्छी बात है। उन्होंने कहा-जब हम लोगों के संघ बने गुरु जी ने एक बात कही- हम तुम्हें स्वतंत्र कर रहे हैं स्वच्छंद नहीं कर रहे। उनका कहने का अभिप्राय था कि अब तक तुम संघ में रहते थे, हमारे अंडर में रहते थे। संघ के अनुशासन में रहते थे। अब आपको बाहर जाना है, मैं नहीं रहूंगा। गुरुजी स्वतंत्र तो कर रहे हैं, लेकिन स्वछंद नहीं कर रहे।
आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी आजादी का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। श्रावक चर्या मुनि चर्या का संविधान है। इस भारत में रहने वाले नागरिकों का भी संविधान है। आजादी का मतलब होता है एक कायदे कानून एक नियमों में जीवन व्यतीत करना। जहां पर ऐसा नहीं होता वहां पर स्वच्छंदता आ जाती है। स्वच्छंदता सबसे पहले पाप कराती हैं। जिस पर किसी का कंट्रोल नहीं है। ऐसे व्यक्ति को हम देखते है। वह दिन-रात पाप में ही डूबा रहेगा। यदि कंट्रोल है तो दिन रात पाप में नहीं डूब सकता। यदि हम धार्मिक तरीके से आजादी को देखें तो दो धर्मों का प्रतिपादन हुआ, एक मुनि और एक श्रावक और दोनों के कायदे कानून बनाए गए दोनों के कायदे कानून ऐसे बनाए गए कि दोनों पालन कर सकें।
स्वतंत्रता का आनंद संयम साधना में
आचार्य श्री ने स्वतंत्रता के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता का आनंद स्वच्छंदता में नहीं संयम साधना में है। स्वतंत्रता यह कहती है कि अपने धर्म के अनुसार अपने गुणों के अनुसार जीवन को व्यतीत करे लेकिन, हम ऐसा नहीं करते। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी स्वतंत्रता से क्या लाभ जो हमें गर्त में ले जाए। स्वतंत्रता ऐसी होनी चाहिए जो हमारा उत्थान करें, हमें इतने उत्थान पर ले जाए कि हम भी ना सोच पाए। स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं स्वतंत्र हैं स्वच्छंद नहीं है। आप संविधान के विरुद्ध कुछ काम नहीं कर सकते। यदि स्वच्छंदता की कोशिश कर रहे तो आप पर कैस चलेगा और आपको सजा और जेल हो सकती है।
नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है
यदि इसे धर्म दृष्टि से देखें श्रावक धर्म के हिसाब से देखे यदि अपने धर्म का संविधान तोड़ा तो वह धर्म के विरुद्ध होगा, स्वच्छंद होगा और आपको नरक निगोद जाना पड़ेगा। यहां जेल जाना पड़ता है, वहां नरक जाना पड़ता है। यहां जेल में भूखा प्यास रहना पड़ता है वहां नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है।
किसी भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी
बच्चे बड़े हो गए कहते हैं कि हमें आजादी चाहिए उन्हें पाप करने की आजादी चाहिए। आज तक किसी के भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी लेकिन, पाप करने के लिए पाप कार्यों के लिए आजादी मांगी होगी। सब स्वच्छंद होना चाहते हैं। स्वच्छंद होने में हानि बहुत होती है।
सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना
आचार्य श्री ने परतंत्रता के विषय में कहा कि सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना है। जीव को इंद्रिया ही नचा रही है। व्यक्ति इंद्रियों से आकर्षित होता है यही परतंत्रता है। पांच इंद्रियों और मन स्वच्छंद होता है। हममें इतनी ताकत ही नहीं है कि हम कंट्रोल कर सकें। कंट्रोल करने का मतलब होता है कि स्वच्छंद समाप्त कर ले। उन्होंने कहा घर की रसोई यदि सही है तो मान के चलना की 99 प्रतिशत यह बात सत्य है कि घर का प्रत्येक व्यक्ति संस्कारी है। स्वतंत्रता का अर्थ होता है इंद्रिय विषयों की पराधीनता को समाप्त करना। उन्होंने कहा हम देश की आजादी मना रहे हैं हम यह सोचे कि हम अपनी आजादी कब मनाएंगे। हमें देश के मौलिक अधिकार मिले। इस देश की नागरिकता मिली। ऐसी स्वतंत्रता कब आएगी कि हम सिद्धालय में विराजमान होंगे। ऐसी स्वतंत्रता वास्तविक स्वतंत्रता है।













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