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आर्यिका सरस्वती माताजी ससंघ के सानिध्य में हुआ कार्यक्रम : आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर किया ध्वज वंदन


जैन जगत के सर्वोच्च मुनिराज, बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती, आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव वर्ष के शुभारंभ पर संपूर्ण भारत में सभी जैन जिनालयों में एक साथ शांति सागर ध्वज वंदन किया गया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत सनावद नगर में चातुर्मासरत आर्यिका सरस्वती माताजी ससंघ के सानिध्य में श्री पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर, शुपार्श्वनाथ मंदिर और आदिनाथ मंदिर में सभी समाजजनों द्वारा प्रातः ध्वज वंदन किया गया। पढ़िए सन्मति जैन की विशेष रिपोर्ट…


सनावद। जैन जगत के सर्वोच्च मुनिराज, बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती, आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव वर्ष के शुभारंभ पर संपूर्ण भारत में सभी जैन जिनालयों में एक साथ शांति सागर ध्वज वंदन किया गया। सन्मति जैन काका ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत सनावद नगर में चातुर्मासरत आर्यिका सरस्वती माताजी ससंघ के सानिध्य में श्री पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर, शुपार्श्वनाथ मंदिर और आदिनाथ मंदिर में सभी समाजजनों द्वारा प्रातः ध्वज वंदन किया गया। साथ ही, आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के चित्र के समक्ष सभी ने दीप प्रज्वलित किया।

इस अवसर पर आर्यिका अनंतमति माताजी ने कहा कि यदि आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज आज नहीं होते, तो जैन परंपरा में साधु परंपरा नहीं होती। जैन धर्म अनादिकाल से जीवंत है, और इसे जीवंत रखने का श्रेय आचार्य श्री को ही जाता है। उन्होंने आयतनों और जिनवाणी की रक्षा की, और मुनियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। पंचम काल में साधु कैसे होना चाहिए, यह सब आचार्य श्री ने बताया। आर्यिका सरस्वती माताजी ने भी आचार्य श्री के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आचार्य शांति सागर महाराज, 20वीं सदी के प्रमुख दिगंबर आचार्य हैं। वे उत्तरी भारत में विचरण करने वाले पहले दिगंबर जैन संत थे। उनका जन्म 1873 में यालागुडा, कर्नाटक में हुआ था, और उनके पिता का नाम भीमगौडा पाटिल और माता का नाम सत्यवती था। आचार्य श्री का नाम “शांति सागर” उनकी शांत स्वभाव का प्रतीक था।

आज जो पिच्छी धारी साधु हम देख रहे हैं, वे आचार्य श्री की देन हैं। जैन धर्म उनके बताए सिद्धांतों पर निरंतर गतिशील है। वर्तमान में, आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की परंपरा का निर्वहन करने वाले साधु हैं वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश, आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज, जो आज भी गुरुदेव के बताए पदचिन्हों पर दृढ़ता से चल रहे हैं। इस अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन अचिंत्य जैन ने किया।

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