नगर में इन दिनों भक्ति आस्था श्रद्धा समर्पण का संगम देखने को मिल रहा है एक और जहां परम पूज्य आनंद सागर महाराज आनंद के साथ पीयूष वाणी से धर्म रूपी आनंद की वर्षा कर रहे हैं। रामगंजमंडी से अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी । नगर में इन दिनों भक्ति आस्था श्रद्धा समर्पण का संगम देखने को मिल रहा है एक और जहां आचार्य श्री आनंद सागर महाराज आनंद के साथ पीयूष वाणी से धर्म रूपी आनंद की वर्षा कर रहे हैं। नगर में स्थित कंचन सिटी धर्ममय बनी हुई है। प्रसंग है दीक्षार्थी संयम मेहता की दीक्षा का जो 6 मई को संसार की मोह माया से विरक्ति लेकर आचार्य श्री आनंद सागर महाराज के कर कमलों से दीक्षा लेंगे। रविवार की रात्रि की बेला में दीक्षार्थी संयम मेहता की घोड़ी पर बिठाकर दूल्हे की तरह ईनाणी निवास से नगर के प्रमुख मार्गो से बिनौली यात्रा निकाली गई। दीक्षा से पूर्व इन दृश्यों को देख नगर का वातावरण इन अनुपम क्षणों को देख गदगद है। एक दिन दीक्षा लूंगा मन में यह भाव के साथ वैराग्य भक्ति गीतों की गूंज सुनाई दे रही है। दीक्षार्थी अमर रहे जैसे जयघोष सुनाई पढ़ रहे है। दीक्षा की किया से पूर्व सोमवार की दोपहर बेला में कंचन सिटी में दीक्षार्थी के हल्दी की क्रिया संपन्न हुई, जो बहुत ही भक्तिमय रही।
मंगलवार को निकलेगी दीक्षार्थी की वर्षीदान यात्रा
मंगलवार की बेला में नगर में दीक्षार्थी संयम मेहता की वर्षीदान यात्रा निकाली जाएगी। जिसमें सर्व समाज सम्मिलित होगी। यह दृश्य अपने आप में बहुत ही विहंगम होगा। जब संसार के संपूर्ण वैभव का त्याग करते हुए दीक्षार्थी नगर के प्रमुख मार्गो से गुजरेंगे।
क्या होता है वर्षीदान ?
वैराग्य की ओर बढ़ने वाला व्यक्तित्व संपूर्ण वैभव का त्याग करने के लिए अग्रसर रहता है लेकिन, तीन दर्शन में वर्षीदान की परंपरा दीक्षा से पूर्व बताई गई है। जैन परंपरा में दीक्षा से पूर्व वर्षीदान इसलिए किया जाता है ताकि संसार के प्रति मोह और संपत्ति का त्याग पूरी तरह हो सके और अंतिम समय में कोई आकांक्षा शेष न रहे। यह वैराग्य की सर्वोच्च भावना, करुणा और आत्मकल्याण का प्रतीक है। मुमुक्षु अपने सभी सांसारिक बंधनों को तोड़कर निस्पृह (बिना किसी इच्छा के) होना चाहता है, इसलिए धन, स्वर्ण, और संपत्ति को दान कर देता है, बताते हैं।
करुणा और उपकार: निर्धन और जरूरतमंदों की मदद करना, जो तप के मार्ग पर चलने से पहले एक अंतिम सामाजिक कर्तव्य है।
ऋण मुक्ति: माना जाता है कि ऐसा करने से सांसारिक ऋण चुकता हो जाता है और दीक्षा में कोई बाधा नहीं आती, यह तपस्या का मार्ग चुनने से पहले भौतिक दुनिया से पूर्ण विरक्ति का प्रतीक है।













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