प्रियंका पवनघुवारा ने डिजिटल लत पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि अगर बच्चों का बचपन स्क्रीन में खो गया तो भविष्य केवल सिसकता रह जाएगा। ऑस्ट्रेलिया के सख्त कदमों से भारत को सीख लेनी चाहिए। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की खास रिपोर्ट…
टीकमगढ़। आज की पीढ़ी की बचपन की परिभाषा बदल गई है। अब न कहानियों की किताबें हैं, न मिट्टी की सोंधी खुशबू, न पेड़ के झूले — इन सबकी जगह ले ली है मोबाइल स्क्रीन, रील्स और गेमिंग ऐप्स ने। यही चिंता जताई है प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक प्रियंका पवनघुवारा ने। उन्होंने कहा कि बचपन अगर स्क्रीन में खो गया, तो एक संवेदनशील समाज का भविष्य गुम हो जाएगा। आज के बच्चे स्मार्टफोन की कैद में हैं, जो उन्हें चिड़चिड़ा, अकेला और भावनात्मक रूप से असंतुलित बना रहा है।
ऑस्ट्रेलिया से सीख लेते हुए निर्णायक नीति बनानी चाहिए
उन्होंने इसे केवल परिवार नहीं, पूरी व्यवस्था की चिंता बताया। प्रियंका जी का मानना है कि भारत सरकार को ऑस्ट्रेलिया से सीख लेते हुए निर्णायक नीति बनानी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया ने जो किया ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (Facebook, Instagram, TikTok, YouTube) पर प्रतिबंध लगाने का कानून पारित किया है। यह नीति 10 दिसंबर से लागू होगी, और उल्लंघन पर 5 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगेगा।
भारत को क्या करना चाहिए?
– 16 वर्ष से कम बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने का कानून
– स्क्रीन टाइम की समय सीमा तय हो
– मजबूत आयु सत्यापन प्रणाली
– अनिवार्य कंटेंट फ़िल्टर
– देशव्यापी डिजिटल डिटॉक्स अभियान
प्रियंका पवनघुवारा कहती हैं कि हमें सिर्फ डिजिटल दक्ष नहीं, संवेदनशील नागरिक तैयार करने होंगे। यह केवल तकनीकी नहीं, राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का विषय है।”
🚨 चेतावनी:
अगर अब नहीं चेते, तो अगली पीढ़ी हाथ में स्क्रीन लेकर जीती तो दिखेगी, लेकिन असल ज़िंदगी से पूरी तरह कटी होगी।













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