राजस्थान के संत समाचार

राजस्थान के जैन संत 23 भट्टारक प्रभाचंद्र साहित्य और पुरातत्व के प्रति जनसाधारण में आकर्षण पैदा किया: राजस्थान में कितने ही मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित मूर्तियां मिलती हैं


राजस्थान के जैन संत के परिचय में हमें कई ऐसे संतों के बारे में जानने का मौका मिलता है, जिनकी अद्भुत बुद्धिकुशलता के सामने सभी जन नत्मस्तक हुए। भट्टारक प्रभाचंद्र भी ऐसे ही संत थे। जिन्होंने साहित्य के जीर्णोद्धार से लेकर मंदिरों के संरक्षण के प्रति जैन समाज में जनजागरण का बीड़ा उठाया था। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 23वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक प्रभाचंद्र के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..


इंदौर। प्रभाचंद्र के नाम से चार प्रसिद्ध भट्टारक हुए। प्रथम भट्टारक प्रभाचंद्र बालचंद के शिष्य थे। जो सेनगण के भट्टारक थे तथा 12वीं शताब्दी में हुए थे। दूसरे प्रभाचंद्र भट्टारक रत्नकीर्ति के शिष्य थे, जे गुजारत की बलाल्कारगण उत्तर शाखा के भट्टारक बने थे। ये चमत्कारिक भट्टारक थे और एक बार इन्होंने अमावस्या को पूर्णिमा कर दिखाई थी। देहली में राघो चेतन में जो विवाद हुआ था। उसमें इन्होंने विजय प्राप्त की थी। अपनी मंत्र शक्ति के कारण ये पालकी सहित आकाश में उड़ गए थे। इनकी मंत्र शक्ति के प्रभाव से बादशाह फिरोजशाह की मलिका इतनी प्रभावित हुई कि उन्हें राजमहल में जाकर दर्शन देने पड़े। तीसरे प्रभाचंद्र भट्टारक जिनचंद्र के शिष्य थे और चौथे प्रभाचंद्र भट्टारक ज्ञानभूषण के शिष्य थे। यहां भट्टारक जिनचंद्र के शिष्य प्रभाचंद्र के जीवन पर प्रकाश डाला जाएगा। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार प्रभाचंद्र खंडेलवाल जाति के श्रावक थे और वेद इनका गौत्र था। ये 15 वर्ष तक गृहस्थ रहे।

एक बार भट्टारक जिनचंद्र विहार कर रहे थे कि उनकी दृष्टि प्रभाचंद्र पर पड़ी। इनकी अपूर्व सूझबूझ एवं गंभीर ज्ञान को देखकर जिनचंद्र ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। यह कोई संवत 1551 की घटना होगी। 20 वर्ष तक इन्हें अपने पास रखकर खूब विद्याध्ययन करवाया। अपने से भी अधिक शास्त्रों का ज्ञाता तथा वाद-विवाद में पटु बना दिया।

संवत 1571 में दिल्ली में हुआ पट्टाभिषेक 

संवत 1571 की फाल्गुन कृष्ण 2 को इनका दिल्ली में पट्टाभिषेक हुआ। उस समय ये पूर्ण युवा थे और अपनी अलौकिक वाक शक्ति एवं साधु स्वभाव से बरबस ह्रदय को स्वतः ही आकृष्ट कर लेते थे। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार ये 25 वर्ष तक भट्टारक रहे। वीपी जोहरापुरकर ने इन्हें केवल 9 वर्ष तक भट्टारक पद पर रहना लिखा है। भट्टारक बनने के बाद इन्होंने अपनी गद्दी को दिल्ली से चित्तौड़ राजस्थान में स्थानांतरित कर ली। इस प्रकार भट्टारक सकलकीर्ति की शिष्य परंपरा के सामने जा डटे। इन्होंने अपने समय में ही मंडलाचार्यों की नियुक्ति की। इनमें धर्मचंद्र को मंडलाचार्य बनने का सौभाग्य मिला। संवत 1593 में मंडलाचार्य धर्मचंद्र द्वारा प्रतिष्ठित कितनी ही मूर्तियां मिलती है। इन्होंने आवां नगर में अपने तीन गुरुओं की निषेधिकाएं स्थापित की। इससे ज्ञात होता है कि प्रभाचंद्र का इसके पूर्व समाधिमरण हो चुका था। प्रभाचंद्र अपने समय के प्रसिद्ध और समर्थ भट्टारक थे।

प्रभाचंद्र जी का विहार, साहित्य लेखन और प्रतिष्ठाएं 

भट्टारक प्रभाचंद्र ने सारे राजस्थान में विहार किया। शास्त्र भंडारों का अवलोकन किया। उनमें नई-नई प्रतियां लिखवाकर प्रतिष्ठापित की। राजस्थान के शास्त्र भंडारों में इनके समय लिखी गई कई प्रतियां संग्रहीत है और इनका यशोगान गाती हैं। संवत 1575 की मार्गशीर्ष शुक्ल 4 को बाई पार्वती ने पुष्पदंत कृत जसहर चरित्र की प्रति लिखवाई और भट्टारक प्रभाचंद्र को भेंट स्वरूप दी। संवत 1579 के मृगशिर मास में इनका टोंक नगर में विहार हुआ। चारों ओर आनंद और उत्साह का वातावरण छा गया। इसी विहार की स्मृति में पंडित नरसेन कृत सिद्धचक्र कथा की प्रतिलिपि खंडेलवाल जाति में उत्पन्न टोंग्या गौत्र वाले साह धरमसी एवं उनकी भार्या खातू ने अपने पुत्र पौत्रादि सहित करवाई और उसे बाई पदमसिरी को स्वाध्याय के लिए भेंट दी। भट्टारक प्रभाचंद्र ने प्रतिष्ठा कार्य में भी पूरी दिलचस्पी ली। भट्टारक गादी पर बैठने के बाद कितनी ही प्रतिष्ठाओं का नेतृत्व किया। जनता को मंदिर निर्माण की ओर आकर्षित किया।

संवत 1571 की ज्येष्ठ शुक्ल 2 को षोडशकारण यंत्र और दशलक्षण यंत्र की स्थापना की। इसके दो साल बाद संवत 1573 की फाल्गुन कृष्ण 3 को एक दशलक्षण यंत्र स्थापित किया। संवत 1578 की फाल्गुन शुक्ल 9 को तीन चौबीसी की मूर्ति प्रतिष्ठा करवाई। इसी तरह 1583 में भी चौबीसी की मूर्ति की प्रतिष्ठा इन्होंने करवाई। राजस्थान में कितने ही मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित मूर्तियां मिलती हैं। प्रभाचंद्र ने राजस्थान साहित्य और पुरातत्व के प्रति जो जनसाधारण में आकर्षण पैदा किया था। वह इतिहास में सदा चिर स्थायी रहेगा।

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