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इंद्रिय जनित विषय भोगों की आकांक्षा दुःख का कारण है और परिणामों की अत्यंत निर्मलता ही धर्म है : आर्यिका विभा श्री ने प्रवचन में कहा 


गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन के दौरान कहा कि इंद्रिय जनित विषय भोगों की आकांक्षा दुःख का कारण है और परिणामों की अत्यंत निर्मलता ही धर्म है। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…


रांची। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन के दौरान कहा कि इंद्रिय जनित विषय भोगों की आकांक्षा दुःख का कारण है और परिणामों की अत्यंत निर्मलता ही धर्म है। एक सनतकुमार चक्रवर्ती हुए जिसको 100 साल तक कुष्ठ रहा लेकिन उन्होंने शरीर के कष्ट को कष्ट नहीं समझा इधर शरीर में वेदना हो रही है उधर आत्मा के भिन्नत्व की भावना कर रहे है । इसका औचित्य था कि उसने शरीर और आत्मा में भेद कर लिया था कि आत्मा अलग है और शरीर अलग है। अगर कोई किसी की निन्दा करता है तो उसे हम बिना प्रमाण के स्वीकार कर लेते हैं और यदि कोई किसी की प्रशंसा करे तो बिना परीक्षा के स्वीकार नहीं करते हैं।

चौथा- अंतर्ध्यान है निदान 

भगवान महावीर की दृष्टि में कितनी गहराई है, जिसको हम सुख समझ रहे हैं भगवान उसे पीड़ा कह रहे हैं। निदान का अर्थ है कि वर्तमान में किए जाने पुण्यकर्म के बदले में आगामी जन्म में इंद्रियजनित विषय भोगों की आकांक्षा रखना। इस लोक में और परलोक में भोगों की आकांक्षा पीड़ा है या सुख है , मेरा सात खण्ड का महल हो जाए यह भावना करना पीड़ा है या सुख है । सम्राट बनने की आकांक्षा पीड़ा या सुख है ।

 चाहने से किसी को कुछ नहीं मिलता है 

सच्चा सुख आंख बंद करके अपनी अंतरात्मा से ही है। मेरा पुण्य नहीं होगा तो मुझे कुछ भी मिलने वाला नहीं है, यदि मैंने किसी वस्तु की चाह रखी है और वह चाहत पूरी नहीं हो सकती तो यह मेरे लिए पीड़ादायक होगी और यदि चाहत पूरी हो जाती है तो वही हमारे लिए सुख में बदल जाता है। निरंतर चिंतवन करते रहना कि मुझे इस लोक मे वैभव, संपत्ति, यश और परलोक में भी अच्छी गति, सुख, वैभव आदि की पूर्ति की मनोकामनाओ लिए हुए पूजा-पाठ, विधान आदि करते – करवाते हैं। यह निदान अंतर्ध्यान है। कुछ लोगों के पास करोड़ों की संपत्ति होती है वे फिर भी और कमाने में लगे रहते हैं, संतुष्ट नहीं है वे स्वाध्याय , धर्मध्यान के लिए समय नही निकाल पाते उनकी तृष्णा अनन्त होती है। वे निरंतर सबसे अमीर व्यक्ति बनने के चिंतवन मे लगे रहते है, जबकि पुन्य कर्म के अभाव में ऐसा होना असंभव है , ऐसे व्यक्ति निदान आर्त ध्यान में निरंतर लगे रहते है । हममे से अधिकतर ने गलत धारणा बना रखी है कि जितना धन आयेगा उतना सुख मिलेगा, विचार कर देखिये अमीर से अमीर आदमी सुखी नही है क्योकि तृष्णाऔ का कोई अन्त नही है , संसारिक सुख भी संतुष्टि में ही मिलता है। अपने बहुमूल्य समय को सिर्फ पैसा, संपत्ति बढ़ाने मे नही लगाना चाहिए, वह सब इसी लोक में छोड़कर परलोक जाना होगा, जिसमें सिर्फ धर्म, ज्ञान, दर्शन आदि का निर्माण शरीर के साथ जाते है। कुछ समय अपने कल्याण के लिए धर्म – ध्यान , स्वाध्याय के लिये अवश्य निकालें जिसमें परिणामों की विशुद्धि रही तो अच्छा आयु कर्म बंध सकेगा।

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