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क्या हम अपने ही धर्म के विनाश के दोषी हैं? : समाज स्वयं अपने धर्म की रक्षा नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा?


दक्षिण भारत—वह भूमि जहाँ कभी आचार्य कुंदकुंद, आचार्य शांतिसागर और अनेकों महान जैनाचार्यों की वाणी गूँजती थी, जहाँ का प्रत्येक पत्थर, प्रत्येक पर्वत और प्रत्येक धरा जैन दर्शन की सुगंध से भरी हुई थी। मुरैना/सांगानेर से अंशुल शास्त्री के आलेख पढ़िए, प्रस्तुति मनोज जैन नायक की


मुरैना/सांगानेर। दक्षिण भारत—वह भूमि जहाँ कभी आचार्य कुंदकुंद, आचार्य शांतिसागर और अनेकों महान जैनाचार्यों की वाणी गूँजती थी, जहाँ का प्रत्येक पत्थर, प्रत्येक पर्वत और प्रत्येक धरा जैन दर्शन की सुगंध से भरी हुई थी। एक समय था जब दक्षिण भारत जैन धर्म का सबसे विशाल और प्रभावशाली केंद्र माना जाता था। वहाँ असंख्य जिनालय, जिनप्रतिमाएँ और साधु-संतों की परंपरा जीवित थी परंतु, आज वही दक्षिण भारत एक भयावह परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जिन मंदिर, जो कभी श्रद्धा के दीपक थे, आज खंडहरों में बदलते जा रहे हैं। जिन प्रतिमाएँ, जो कभी भक्ति और दर्शन का केंद्र थीं, आज इतनी खंडित हो चुकी हैं कि उनका स्वरूप तक पहचान में नहीं आता। कहीं उनके अंग टूट चुके हैं, कहीं वे उपेक्षा की धूल में दब गई हैं और कहीं वे इतिहास के अंधकार में गुम हो रही हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं है कि मंदिर टूट रहे हैं, सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि समाज चुप है। लोग अपने घरों की सजावट पर लाखों खर्च कर सकते हैं, पर टूटते जिनालयों के लिए उनके पास समय नहीं। लोग अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा दिलाने में गर्व महसूस करते हैं पर, उन्हें अपने धर्म, अपने तीर्थ और अपने इतिहास का एक अक्षर तक नहीं सिखाते। यदि जैन समाज स्वयं अपने धर्म की रक्षा नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा?

समाज को नींद से जगाया जाए

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि केवल दु:ख प्रकट किया जाए, आवश्यकता इस बात की है कि समाज को नींद से जगाया जाए। जो समाज अपने मंदिरों, अपनी प्रतिमाओं और अपनी परंपरा की रक्षा नहीं कर सकता, वह धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो देता है। केवल नाम के जैन बनकर रह जाना और अपने धर्म के विनाश को अपनी आँखों के सामने देखते रहना यह सबसे बड़ा अपराध है। यह केवल पत्थरों के टूटने की कहानी नहीं है, यह जैन संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व के बिखरने की कहानी है। प्रश्न यह नहीं है कि प्रतिमाएँ क्यों टूट रही हैं; प्रश्न यह है कि उन्हें बचाने वाला कौन है? वह समाज कहाँ है जो स्वयं को जैन कहता है? वह चेतना कहाँ है जो अपने धर्म, अपने तीर्थों और अपनी विरासत की रक्षा कर सके?

जिनालयों, प्रतिमाओं के संरक्षण के लिए खड़े हों

यदि आज भी समाज नहीं जागा, तो आने वाले समय में दक्षिण भारत का वह गौरवशाली जैन इतिहास केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएगा। आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह पढ़ेंगी कि कभी दक्षिण भारत जैन धर्म का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। अब समय आ गया है कि दक्षिण भारत का जैन समाज फिर से अपनी पहचान को जाने, अपने जिनालयों और जिनप्रतिमाओं के संरक्षण के लिए खड़ा हो और यह स्मरण करे कि यदि धर्म के प्रतीकों को नहीं बचाया गया, तो केवल प्रतिमाएँ ही नहीं टूटेंगी—पूरी परंपरा टूट जाएगी।

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