सनावद में पर्युषण पर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी बड़े भक्तिभाव के साथ मनाई गई। मुनि श्री साध्य सागर जी और मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर अपने प्रवचन दिए। इस अवसर पर मंदिरों में अभिषेक, पूजन और संगीतमय आरती का आयोजन हुआ। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…
सनावद में दशलक्षण पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी पर भव्य रूप से हुआ। इस दिन को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के रूप में मनाया गया। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल इन्द्रियों का संयम ही नहीं बल्कि आत्मा में रमण करना है। ब्रह्म अर्थात शुद्धात्मा में लीनता ही ब्रह्मचर्य है। उन्होंने बताया कि जो साधक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वही आत्मानंद की प्राप्ति करता है। मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी ने कहा कि आत्मा को जानना और उसमें लीन होना ही सच्चा ब्रह्मचर्य है। उन्होंने पांचों इंद्रियों के विषयों पर नियंत्रण को भी ब्रह्मचर्य का महत्वपूर्ण अंग बताया।
संत निलय में पंचामृत अभिषेक
धार्मिक आयोजन में सुबह पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर और संत निलय में पंचामृत अभिषेक हुआ। शांति धारा, विशेष पूजन और भगवान वासुपूज्य के मोक्ष कल्याणक पर लड्डू चढ़ाने का सौभाग्य जैन समाज के अनेक परिवारों को मिला।आदीनाथ, सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ मंदिरों में मुनिराजों के सानिध्य में दोपहर अभिषेक हुआ। संध्या में संगीतमय आरती और भक्ति का आयोजन हुआ जिसमें अनेक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कार्यक्रम में समाज के अनेक बंधु-भगिनियों ने अपनी सेवाएं दीं।













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