टोंक में सोलहकारण भावना पर्व के अंतर्गत आज दूसरी विनयसंपन्नता भावना का दिवस मनाया गया। आचार्य वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में विनय को मोक्ष का द्वार बताते हुए रत्नत्रय धर्म की भावना में बहने का आह्वान किया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…
टोंक में चल रहे सोलहकारण भावना पर्व के अंतर्गत आज विनयसंपन्नता भावना का आयोजन विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ हुआ। धर्मसभा में राजकीय अतिथि पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना देते हुए कहा कि आत्मा का वास्तविक घर सिद्धालय है, जो सात राजू ऊपर स्थित है। उन्होंने बताया कि चौरंगी चार गति वाले संसार में लौकिक सुख क्षणिक है, जबकि आत्मा का सुख स्थायी और शाश्वत है। यह सुख केवल रत्नत्रय—सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र—की भावना में बहने से ही प्राप्त हो सकता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे अच्छे और लंबे समय तक फल पाने के लिए स्वस्थ बीज, उचित खाद और पानी जरूरी है, वैसे ही धर्म के बीज को जिनवाणी, संयम, तप और त्याग से सींचना आवश्यक है। सोलह भावना का चिंतन किए बिना शाश्वत मोक्ष फल प्राप्त करना संभव नहीं है।
धर्मसभा के पूर्व आर्यिका श्री शुभ मति माताजी ने विनयसंपन्नता भावना पर विस्तार से विवेचना की। उन्होंने बताया कि रत्नत्रय के विषय में विनय करना और कषाय से निवृत्ति जरूरी है। उन्होंने विनय के पाँच भेद बताते हुए कहा कि विनय ही मोक्ष का द्वार है। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में श्रावक-श्राविकाओं से आग्रह किया कि वे स्वयं से पूछें—हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और कहाँ जाना है। उन्होंने पुण्य अर्जन के महत्व को समझाते हुए कहा कि संसार से आवागमन समाप्त करने के लिए मन, वचन और काय से 12 भावना, धर्म, ज्ञान और तप द्वारा कर्मों का हवन करना जरूरी है।
पाँच जिनालय मंदिरों के दर्शन करेंगे
इस अवसर पर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र के गणमान्यजन आचार्य श्री के दर्शन के लिए उपस्थित हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला और प्रांत स्तरीय पदाधिकारी राकेश जैन, रामप्रकाश विजय, लक्ष्मण, अशोक, अनिल पाटीदार, महेंद्र विजय आदि ने आचार्य श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्य श्री 12 अगस्त की सुबह संघ सहित पुरानी टोंक के पाँच जिनालय मंदिरों के दर्शन करेंगे और उपदेश प्रदान करेंगे।













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