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आचार्यश्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा-ध्यान मतलब मन की एकाग्रता : ध धर्मसभा में मन, ध्यान और मानसिकता के बारे में दिए संदेश 


सोमवार सुबह श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर परिसर धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। मंगलाचरण सुधा डूंगरवाल ने किया। धर्म सभा का संचालन राजकुमार गंगवाल ने किया। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ध्यान के विषय में प्रकाश डाला। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाडिया की यह खबर…


रामगंजमंडी। नगर में सोमवार सुबह श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर परिसर धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। मंगलाचरण सुधा डूंगरवाल ने किया। धर्म सभा का संचालन राजकुमार गंगवाल ने किया। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ध्यान के विषय में प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने ध्यान का मतलब समझाते हुए कहा कि किसी एक विषय में एकाग्र होना ध्यान है। मन की एकाग्रता से ही ध्यान प्रारंभ होता है। ध्यान में सबसे बड़ी समस्या मन का दोष है लेकिन, यह दोष मन का नहीं हमारा है क्योंकि, हमने मन को स्वतंत्रता इतनी दे रखी है कि हम कंट्रोल नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंद्रिय विषयों में हम आसक्त हैं। इसलिए बार-बार मन उस पर जाता है। संपूर्ण समस्या की जड़ मन है। यदि हमारी इच्छा शक्ति को दृढ़ कर ले तो तो यह संभव है। हमारी इच्छा शक्ति कमजोर होती है। मन में दृढ़ता नहीं होती है तो मन चंचल होता जाता है। मन को कंट्रोल करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि मन वचन काया इन तीनों चीजों पर कंट्रोल करना ध्यान है। इन पर कंट्रोल करें थोड़ी तकलीफ परिषह सहकर हम कंट्रोल कर सकते हैं। हम मन में विकल्प बना लेते हैं और समय इस विषय वस्तु में निकल जाता है।

ध्यान की भूमिका प्रत्येक व्यक्ति को बनाना चाहिए

आचार्यश्री ने मोबाइल के विषय में कहा कि मोबाइल आने पर 100 प्रतिशत मन चंचल होता जा रहा है जो जानने योग्य नहीं है वह विकल्प जाने लगते हैं। मन के विकल्प का विच्छेद समाप्त करना ध्यान है। मन को विश्वास में लेना ध्यान है। मन इंद्रिय की सुन लेता है लेकिन, आत्मा की नहीं सुनता। ध्यान सुकून का कारण है। सुकून ध्यान से ही प्राप्त होता है। यह लोगों की भ्रांति है कि पर पदार्थ में आसक्ति है तो सुकून मिलता है। जिस समय आसक्ति आती है उस समय त्याग कर दो। जब तक आसक्ति नहीं जाएगी तब तक मन पर कंट्रोल नहीं कर सकते। हमें अनासक्ति का भाव बनाना पड़ेगा। सबको सुकुन चाहिए, सुकून आपको खुद को जागृत करना है। ध्यान की भूमिका प्रत्येक व्यक्ति को बनाना चाहिए। उन्होंने कहा रोगों का कारण शरीर नहीं हमारी मानसिकता है मस्तिष्क की भी एक सीमा है आप मन में विकल्प लेते जा रहे हैं। इसीलिए आप रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। दिमाग खजाना है। आपने इसे कबाड़खाना बना रखा है। मानसिकता यदि खराब होगी तो मन एकाग्र नहीं हो सकता और वह ध्यान नहीं कर सकता और सुकून दिमाग में नहीं फैलता है।

हमारी मानसिकता अमूल्य है

तीन रोग सबसे ज्यादा हैं मानसिक, हार्ट और शुगर। हमारी मानसिकता हमने ही खराब कर रखी है। उन्होंने कहा तुम ही तुम्हारी मानसिकता के वैद्य हो। जब तक दिमाग की गंदगी नहीं निकालेगे अच्छाई नहीं आएगी। हमारी मानसिकता अमूल्य है। इसका कोई मूल्य नहीं है। मानसिकता का ध्यान नहीं रख रहे हैं कबाड़खाना बना रहे हैं ध्यान मानसिकता का विराम है। दुनिया में सबसे ज्यादा जरूरत ध्यान की है यदि ध्यान करना आ जाएगा तो आपको दवा की जरूरत नहीं होगी। आपकी मानसिकता निश्चित ध्यान में होगी। संपूर्ण लाभ देने वाला भी मन है और अनर्थ की ओर ले जाने वाला भी मन है, मन जड़ है। जिधर मुड़ जाओ उधर मुड़ जाएगा।

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