सांसारिक जीव की आस्था कहीं ना कहीं होती है। अंतर इतना है कि मिथ्यात्व पर होती है या सम्यक पर होती है। विश्वास तो करना ही पड़़ता है। कुदेव पर करलें, चाहे सच्चे देव पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर कर लें। आचार्यश्री विनिश्चयसागर जी ने यह धर्मसभा में कहा। रामगंजमंडी से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
रामगंजमंडी। सांसारिक जीव की आस्था कहीं ना कहीं होती है। अंतर इतना है कि मिथ्यात्व पर होती है या सम्यक पर होती है। विश्वास तो करना ही पड़़ता है। कुदेव पर करलें, चाहे सच्चे देव पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर कर लें या विपरीत स्वरूप पर करलें। वस्तु के सही स्वरूप पर विश्वास करने वाला व्यक्ति सम्यक दृष्टि होता है। विपरीत पर विश्वास करने वाला व्यक्ति मिथ्या दृष्टि होता है। आचार्यश्री विनिश्चयसागर जी ने कहा कि क्रिया का महत्व नहीं होता, श्रद्धा का महत्व होता है। आपका श्रद्धा विश्वास कैसा है, वह कौन है। सम्यक दर्शन का कार्य सच्चाई से जोड़ना है। वह आभास दिलाता है और सत्य को पहचानता है। मार्ग सब जानते हैं लेकिन, मार्ग सच्चा है या झूठा यह हम नहीं जानते। आचार्यश्री ने श्रावको को समझाते हुए कहा कि शरीर को सब जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि शरीर जीव नहीं हैं।
दुकान मकान के लिए सब कहते हैं कि यह मेरा है। यह नहीं जानते कि यह संयोग है। अंतर इतना ही है कि वस्तु का सही स्वरूप पहचाना सम्यक दर्शन है। विपरीत को पहचानना मिथ्यात्व है। प्रशम भाव और समभाव को समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि राग छोड़ने का प्रयास करें तो प्रशम भाव एवं समभाव है, राग को बढ़ाने से राग बढ़ता है। आपने मोबाइल का उदाहरण देते हुए बताया कि मोबाइल सबके पास है, खाली बैठे हैं तो रील आदि देखने लगते है। फिर थोड़ी देर बाद दोबारा देखने का मन हो गया तो राग बढ़ गया।
आस्था तो चेतन भाव से बनेगी
उन्होंने कहा पहले-पहले किसी के निधन होने पर 15 दिन में पत्र आता था, जब तक सूतक भी खत्म हो जाया करता था। मृत्यु आदि की सूचना बहुत बाद में मिलती थी, किंतु वर्तमान में मोबाइल ने राग आदि को बढ़ाया है। राग प्रशम भाव को समाप्त करता है। सोने चांदी के बर्तन में खाना खाया जा सकता है, लेकिन बनाया नहीं जा सकता। सोने चांदी के बर्तन में पूजा करने से आस्था नहीं बनेगी। आस्था तो चेतन भाव से बनेगी। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज आप सभी यह संकल्प लें कि हम जब भी मंदिर आएगे मोबाइल लेकर नहीं आएंगे। यहीं से राग छोड़ने की शुरुआत करें। बूंद बूंद से घड़ा भरता है। छोटे छोटे त्याग से ही आप संयम की साधना की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।













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