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कुलचारम से अष्टापद पहुंचे आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी : 2500 किमी की पैदल यात्रा कर अष्टापद पहुंची


7 नवम्बर 2024 को शुरू हुई 2 मई को लगभग 2500 किमी की पैदल यात्रा कर अष्टापद पहुंची।जिसे प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के निर्वाण स्थली के रूप में स्वीकारा जाता है। कोडरमा से पढ़िए, राजकुमार जैन अजमेरा की यह खबर…


अष्टापद /कोडरमा। धन्य है जैन धर्म, धन्य हैं जैन साधु। आज के इस पंचम काल में-7°C की जमा देने वाली बर्फ, जहां 4-4 स्वेटर जॉकेट पहनने पर भी ठंड नही रुकती है। वहां पर गुरुदेव अपनी साधना में अपने चेहरे पर मुस्कान लिए अपने संघ के साथ साधना में रत है। धन्य हो आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी का आज यात्रा का लक्ष्य पूरा हुआ। कुलचारम से अष्टापद पहुंचे अंतर्मना। पहली बार हिमालय की बर्फानी चट्टानों पर -7 तापक्रम में दिगम्बर मुद्रा में रहना आश्चर्य का ही विषय है। जो भेद विज्ञान को शब्दों में नहीं जीवन में जीवंत करके दिखाता है। 7 नवम्बर 2024 को शुरू हुई 2 मई को लगभग 2500 किमी की पैदल यात्रा कर अष्टापद पहुंची। जिसे प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के निर्वाण स्थली के रूप में स्वीकारा जाता है। अष्टापद आदिश्वर स्वामी आठ पर्वत शिखरों के बीच बसी बद्रीनाथ नगरी में सर्वप्रथम आचार्य श्री विद्यानंद जी ने चरण रखे थे। उसके बाद तो सभी की ये भावना होने लगी कि एक बार तो बद्रीनाथ जाना ही चाहिए। हाल में अपनी एक मूर्ति 24 भगवान के चरण बने हैं। निकट ही अपनी धर्मशाला है।

कुंड से खोलता पानी सदैव निकलता रहता है

हिंदू मंदिर बाहर से फूलों से सजे होने के कारण बहुत ही अच्छा दिखता है पर भीतर उतनी भव्यता दृष्टिगोचर नहीं होती। बहती नदी से पुल पार कर उस मंदिर पहुंचते हैं। नदी के पास ही एक कुंड से खोलता पानी सदैव निकलता रहता है। लोग इसमें नहाकर मंदिर में प्रवेश करते हैं। जैन मंदिर के बाएं तरफ की हिमालय चोटी पर सदैव बहुत बर्फ रहती है। उस ओर लगभग दो तीन किमी की कठिन चढ़ाई करके एक विशाल चरण बने हैं। अकलंक एक धागा डालकर मूर्ति को अपूज्य मानते हैं। अतः वहां की मूर्तियों से अपने धर्म का कुछ लेना-देना नहीं पर क्षेत्र तीर्थ की दृष्टि से निर्वाण स्थली तो है ही। मंगलाष्टक में कैलाश पर्वत को निर्वाण स्थल माना है, जो चीन में है। दोनों स्थलों में बहुत अंतर है। वहां सब जा भी नहीं सकते। अतः इसे ही निर्वाण स्थली के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

प्राकृतिक दृश्यावली बहुत अच्छी रमणीक है

प्राकृतिक दृश्यावली बहुत अच्छी रमणीक मनमोहक है। शाम को सूर्यास्त के समय पर्वत शिखरों की स्वर्णिम आभा की सुंदरता का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। देखने व अनुभव करने का ही आनंद है। संघपति दिलीप जी व श्रवण जी ने इतिहास रच दिया है। अंतर्मना के निमित्त से सैकड़ों गुरु भक्तों को दर्शन मिल गए। ये गुरु जी व संघपति जी के बहुत उपकार हैं। उनके पुण्य की अनुमोदना। संघस्थ साधुवृंद इतनी शीत परिषह जीत कर कर्म निर्जरा कर रहे उनके चरणों में नमोस्तु, वन्दामि।

इन्होंने अनुमोदना की

कोडरमा से राज कुमार जैन, हैदराबाद से मनोज जैन, कोलकोत्ता से विवेक जैन गंगवाल, कोडरमा से मनीष सीमा जैन सेठी, अहमदाबाद से बंटी जैन ने भी निर्वाण स्थली पर अनुमोदना और नमोस्तु प्रेषित की। संयोग भी ऐसा कि भगवान अभिनंदन जी का मोक्ष कल्याणक दिवस भी है।

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