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आचार्य साधु परमेष्ठी चलते-फिरते तीर्थ : 22 वर्षों के बाद पदार्पण पर हुई धर्मसभा


आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज अपने 9 मुनिराजों, 22 आर्यिकाओं तथा 2 क्षुल्लकों कुल 34 साधुओं का 22 वर्षों के बाद धरियावाद प्रवेश हुआ। कर जिनवाणी भेंट की। आचार्यश्री ने धर्म सभा को संबोधित किया। धरियावद से पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर…


धरियावद। धैर्य, धीरज का फल मीठा होता है। आप काफी वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। तीर्थंकरों की वाणी साक्षात में सुनने को नहीं मिलती है किंतु, उनके द्वारा प्रतिपादित उपदेश जिनवाणी ओर गुरुओं के माध्यम से मिलता है। मनुष्य जन्म बहुत ही दुर्लभता से मिला है। मनुष्य जीवन में देव ,शास्त्र गुरुओं के प्रति श्रद्धा,भक्ति विनय से भगवान भी झुक जाते हैं। वश में हो जाते हैं। नगर में काफी भौतिक प्रगति हो रही है। लगभग 21 वर्षों पूर्व नगर में आए थे। श्री चंद्रप्रभु जिनालय और यहां के मैदान में परिवर्तन हो गया है। भगवान का जिनालय अब नवीन जिनालय हो गया है। समय के साथ प्रगति हुई है। प्रगति निरंतर बनी रहना चाहिए देव अर्थात आचार्य साधु परमेष्ठी चलते-फिरते तीर्थ हैं। उनके प्रति श्रद्धा भक्ति और विनय रखना चाहिए। यह धर्म देशना आचार्यश्री वर्धमान सागर जी महाराज ने नगर में 22 वर्षों के बाद पदार्पण के अवसर पर आयोजित धर्मसभा में प्रकट की।

धर्म के माध्यम से रत्नत्रय को धारण करें

ब्रह्मचारी गज्जू भैया ने बताया कि आचार्यश्री ने आगे उपदेश में कहा कि अरिहंत भगवान से जो धर्म प्राप्त हुआ है। उस धर्म से जीवन को उन्नत बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए क्योंकि, विनय श्रद्धा और भक्ति मोक्ष के द्वार की चाबी है। इस धर्म रूपी चाबी को भूलना या खोना नहीं चाहिए। इसे संभाल कर रखें तथा धर्म के माध्यम से रत्नत्रय को धारण करें। इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व पंडित हंसमुख शास्त्री ने आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज से वर्ष 2025 का चातुर्मास एवं प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव का समापन धरियावद में संघ सहित करने का निवेदन किया

मुनिश्री पुण्य सागर जी ने अपने उद्बोधन में समाज को बताया कि जो सोता है वह खोता है। इसलिए आचार्य श्री के पदार्पण से होली के साथ दीपावली पर्व भी प्रारंभ हो गया है।,अब बारिश के समाप्त होने पर धर्म की बारिश होगी। उसमें भीगने से लाभ होगा। सूखे रहोगे तो कोरे रह जाओगे क्योंकि, आचार्य श्री वर्धमान सागर जी में आचार्य शांति सागर जी से लेकर दीक्षा गुरु आचार्य श्री अजीत सागर जी के गुण समाहित है।

सभी 53 साधुओं ने जिनालयों के दर्शन किए

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की अंतराष्ट्रीय स्तर पर धर्म प्रभावना की है। दशा हमड़ सेठ करणमल, दशा नरसिंहपुरा सेठ दिनेश जेकनावत तथा बीसा नरसिंहपुरा, सेठ गुणवंत डुगावत ने बताया कि आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज अपने 9 मुनिराजों, 22 आर्यिकाओं तथा 2 क्षुल्लकों कुल 34 साधुओं का 22 वर्षों के बाद धरियावाद प्रवेश पर धरियावाद में विराजित मुनिश्री पुण्यसागर जी महाराज ने अपने 18 साधुओं सहित परिक्रमा और चरणवंदना की। पंडित हंसमुख, ब्रह्मचारिणी वीणा दीदी, सम्पूर्ण समाज ने 75 वर्षीय आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की 23 फरवरी को आगवानी की। सभी 53 साधुओं ने जिनालयों के दर्शन किए। घरों के सामने रंगोली बनाई गई।

चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की

नगर के पुरुष महिलाएं धार्मिक मंडल निर्धारित वेषभूषा में अगवानी भक्ति नृत्य पूर्वक जयकारों के साथ की। संपूर्ण नगर के हम भक्तों की हैं अभिलाषा धरियावद में हो चौमासा, देखो देखो कौन पधारे भक्तों के भगवान पधारे, भगवान महावीर और आचार्य श्री वर्धमान सागर के जय जयकार से गूंज रहा था। धर्म सभा में प्रवचन के पूर्व मंगलाचरण हुआ। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन आमंत्रित अतिथियों तथा स्थानीय समाज के पदाधिकारी द्वारा किया गया। सौभाग्यशाली परिवार ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। सभा का संचालन पंडित विशाल ने किया।

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