मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ द्वारा हाल ही में दिए गए एक निर्णय (मुकदमा संख्या 3188/2025) में जैन समुदाय के लिए ‘आक्रमणकारी और ‘घुसपैठिये जैसे शब्दों के प्रयोग पर विश्व जैन संगठन (इंदौर) और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने आक्रोश जताया है। इंदौर से पढ़िए, यह रिपोर्ट…
इंदौर। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ द्वारा हाल ही में दिए गए एक निर्णय (मुकदमा संख्या 3188/2025) में जैन समुदाय के लिए ‘आक्रमणकारी और ‘घुसपैठिये जैसे शब्दों के प्रयोग पर विश्व जैन संगठन (इंदौर) और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने आक्रोश जताया है। संगठन के मयंक जैन एवं प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन धर्म संस्कृति के इतिहास को कलंकित करने वाला और तथ्यों से परे एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी’ है।
जैन इतिहास के साथ क्रूर मजाक
विश्व जैन संगठन इंदौर के पदाधिकारियों ने कहा कि जिस संस्कृति के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा, उसे ‘बाहरी’ या ‘आक्रमणकारी’ बताना हास्यास्पद और अपमानजनक है। जैन धर्म अनादि काल से इसी माटी का अभिन्न अंग है और ‘अहिंसा परमो धर्मः’ जिओ और जीने दो के सिद्धांत के साथ देश के नवनिर्माण में अग्रणी रहा है।
न्यायालय के निर्णय में आपत्तिजनक अंश
विदित हो कि 16 जनवरी को आए 170 पन्नों के निर्णय के बिंदु क्रमांक 8 में न्यायालय ने जैनों और अन्य समुदायों के आगमन को ‘प्रचारक या आक्रमणकारी’ के रूप में वर्णित किया है। मयंक जैन राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ का कहना है कि इतिहास गवाह है कि 8वीं-9वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जैन मुनियों और श्रावकों का भीषण नरसंहार हुआ था। हम पीड़ित रहे हैं। आक्रमणकारी नहीं। एक संवैधानिक संस्था द्वारा बिना ऐतिहासिक शोध के ऐसी टिप्पणी करना जैन समाज के अस्तित्व पर कुठाराघात है।
प्रमुख माँगें और आगामी कदम
दोनों संगठनों ने मांग की है कि न्यायालय इस तथ्यहीन टिप्पणी को स्वतः संज्ञान लेकर रिकॉर्ड से हटाए। समाज के वरिष्ठ अधिवक्ताओं के माध्यम से इस निर्णय के खिलाफ रिव्यू पिटीशन या उच्च सदन में अपील दायर करने की तैयारी की जा रही है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों का प्रस्तुतिकरण
सरकार और पुरातत्व विभाग के समक्ष जैन धर्म की प्राचीनता के प्रमाण कई बार पेश किये जा चुके हैं। निवेदन है कि अदालती फैसलों में ऐसी गलती न दोहराई जाए।
जैन समाज से आह्वान
विश्व जैन संगठन और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने देश भर की ‘जिंदा’ जैन संस्थाओं, कमेटियों और श्रेष्ठी वर्ग से अपील की है कि वे अपनी गहरी नींद से जागें। यदि आज इस ‘काले अध्याय’ का विरोध नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां हमें इतिहास का अपराधी मानेंगी। अहिंसक होने का अर्थ कायर होना नहीं है। हम अपनी धर्म संस्कृति के सम्मान की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक मार्ग से अंतिम सांस तक लड़ेंगे।













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