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आर्यिका संगममति माताजी का 19 वां पदारोहण दिवस मनाया : 19 जिन प्रतिमाओं पर एक साथ अभिषेक एवं शांतिधारा कर जगत कल्याण की भावना भायी 


आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री 108 सिद्धांत सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका 105 संगम मति माताजी का 53 वां अवतरण दिवस एवं 19वां गणिनी पद दिवस श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में सकल दिगंबर जैन समाज ने मनाया। झालरापाटन से पढ़िए, यह खबर…


झालरापाटन। आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री 108 सिद्धांत सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका 105 संगम मति माताजी का 53 वां अवतरण दिवस एवं 19वां गणिनी पद दिवस श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में सकल दिगंबर जैन समाज ने मनाया। आयोजन के क्रम में 19 जिन प्रतिमाओं पर एक साथ अभिषेक एवं शांतिधारा करते हुए विश्व शांति एवं सुख समृद्धि की कामना की गई। गुरु पूजन एवं श्री सम्मेद शिखर जी तीर्थ की पूजन करते हुए द्रव्य समर्पित किए गए।

 संगीतमय भक्ति भाव एवं नृत्य के साथ पूजन किया 

कार्यक्रम में समाज के विभिन्न महिला मंडल, महिलाएं एवं पुरुष सभी ने संगीतकार वेदांत सांवला एवं राजकुमार जैन बैंक वाले के मधुर भजनों पर संगीतमय भक्ति भाव एवं नृत्य के साथ पूजन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए गए। जिसमें प्रमुख रूप से णमोकार महिला मंडल, जागृति महिला मंडल, अखिल भारतीय महिला मंडल, आदिनाथ महिला मंडल, शुभकामना परिवार, महिला मंडल झालावाड़ एवं कोटा के श्रावक श्रेष्ठी गण ने भाग लिया।

कोई भी बिना गुणों के कोई पद प्राप्त नहीं कर सकता 

आर्यिका श्री 105 संगममती माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि कोई भी बिना गुणों के कोई भी पद प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी बड़ा पद प्राप्त करना आसान हो सकता है किंतु, उसकी गरिमा को बनाए रखना बहुत मुश्किल है, जो बहुत आवश्यक है। जिस प्रकार पोथी पढ़ने से कोई पंडित नहीं हो जाता है। उसी प्रकार हम किसी भी शास्त्र के स्वाध्याय में पढ़ने या रटने से कल्याण नहीं कर सकते है अपितु, स्वाध्याय करने के पश्चात दो लाइन पर भी यदि हम चिंतन कर के समझ ले एवं अनुसरण करें तो हमें सही ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है। 

आचार्य श्री सन्मति सागरजी को स्मरण में लाते हुए कहा कि हमारे गुरु दादा तपस्वी सम्राट 108 श्री सन्मति सागर जी महाराज द्वारा मुझे वर्ष 2007 में औरंगाबाद (महाराष्ट्र)में गणिनी पद से विभूषित किया था तथा मेरी आर्यिका दीक्षा 1997 में 29 वर्ष पूर्व हुई थी तब से लेकर आज तक मैंने मेरे गुरु के सामने कभी ऊंची आंख उठा करके नहीं देखा। मैं उनकी हर आज्ञा का पालन कर उनके बताए हुए मार्ग पर चली मेरी अंतिम इच्छा भी यही है कि गुरु के प्रति मेरा सम्मान विनय इसी प्रकार बना रहे एवं मैं मोक्ष मार्ग पर आत्म निर्भर रूप से चलती रहूं क्योंकि, गुरु के बिना किसी का भी उद्धार होना मुश्किल है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है। गुरु ही सन्मार्ग दिखाते हैं। इस अवसर पर बाहर से पधारे अतिथियों का सम्मान समाज के प्रतिनिधियों ने माल्यार्पण कर किया एवं संचालन राजकुमार जैन बैंक वालों ने किया।

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