पदमपुरा के अतिशय क्षेत्र में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के शिष्य आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी(6 पिच्छी) तथा आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी(18 पिच्छी) का आगमन हुआ। आचार्य वर्धमान सागर संघ के साधुओं, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी, पदमपुरा अतिशय क्षेत्र कमेटी और हजारो भक्तों ने दोनों संघों की मंगल अगवानी की। पदमपुरा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
पदमपुरा। पदमपुरा के अतिशय क्षेत्र में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के शिष्य आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी(6 पिच्छी) तथा आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी(18 पिच्छी) का आगमन हुआ। आचार्य वर्धमान सागर संघ के साधुओं, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी, पदमपुरा अतिशय क्षेत्र कमेटी और हजारो भक्तों ने दोनों संघों की मंगल अगवानी की। दोनों आचार्य संघ ने जिनालय में पदमप्रभ के दर्शन कर आचार्य श्री वर्धमान सागरजी के दर्शन कर आचार्य भक्ति पूर्वक चरण वंदना की। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी, आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी एवं आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी के मंचासीन होने पर दोनों आचार्यों ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन किए। धर्मसभा में अनूठा संयोग अतिशय हुआ। जब दिगंबर धर्म की तीनों परंपरा मंच पर प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर, आचार्य श्री आदि सागर परंपरा के आचार्य श्री प्रज्ञासागर जी एवं आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी एवं आचार्य श्री शांतिसागरजी छाणी परंपरा की आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी मंचासीन हुई।
ब्रह्मचारी अवस्था के संस्मरणों को साझा किया
धर्मसभा में आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने उपदेश में 12 तप के बारे में बताया। जैन समाज की पहचान दिगंबर साधुओं से होती है। तीर्थंकर भगवान यथानाम तथागुण अनुरूप होकर असंभव को संभव बनाते हैं। आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी ने आचार्य प्रज्ञा सागर जी और स्वयं के ब्रह्मचारी अवस्था के संस्मरणों को साझा किया। श्री तरुण सागर जी की स्मृति से भावुक हो गए। प्रभु सानिध्य से भक्ति में वृद्धि होती हैं। आचार्य श्री प्रज्ञासागर जी ने बताया कि 12 वर्ष पूर्व दाहोद में 23 फरवरी 2014 को हमारा मिलन हुआ। आपने बताया कि तप, ज्ञान,संयम में वृद्धि होने से प्रज्ञा, प्रसन्न होकर जीवन वर्धमान होता हैं।
साधु का लक्ष्य साधना से प्रसन्नता को प्राप्त होता है
इस अवसर पर आशीर्वचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में आचार्य प्रज्ञासागर जी एवं आचार्य प्रसन्नसागर जी संघ सहित आए हैं। आप दोनों आचार्य पुष्पदंत सागर जी के शिष्य हैं। जिस समय सन 1990 में पारसोला में आचार्य पद हमें प्राप्त हुआ था। तब यह दोनों मुनि युवा अवस्था में विद्यमान रहे। साधु का लक्ष्य साधना से प्रसन्नता को प्राप्त होता है और प्रज्ञा बढ़ने से जीवन आगे बढ़कर वर्धमान होता है। तब परमात्मा बनने की यात्रा प्रारंभ पदमप्रभ बनते हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रकट की।
अष्टमी होने से अधिकांश साधुओं के उपवास रहे
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि सब साधु एक हैं। दोनों आचार्यों के दादा गुरु आचार्य श्री विमलसागर जी से हमने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। संसारभोगी हैं और तीर्थंकर भोग से रहित होकर भगवान बने हैं। हम सब साधना का लक्ष्य लेकर संयमी बने हैं। पीयूष सागर के पिता ने हमसे दीक्षा लेकर मुनि देवेंद्रसागर जी बने तथा देवेंद्र सागर जी के पिता ने हमारे दीक्षागुरु आचार्य धर्मसागर जी से दीक्षा लेकर मुनि जिनेंद्र सागर जी बने। आज अष्टमी होने से अधिकांश साधुओं के उपवास रहे।













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