मां बाप की सेवा करना तथा उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना संतान का पहला कर्तव्य होता है। समग्र पाठशालाओं से आए हुए सभी बच्चों तथा बड़े को संबोधित करते हुए मुनि श्री संभव सागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह खबर…
विदिशा। मां बाप की सेवा करना तथा उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना संतान का पहला कर्तव्य होता है। समग्र पाठशालाओं से आए हुए सभी बच्चों तथा बड़े बच्चों को संबोधित करते हुए मुनि श्री संभव सागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनि श्री ने उन सभी बच्चों के साथ उनके माता पिता को समझाते हुये कहा कि आप लोगों को भी यह ख्वाब नहीं देखना चाहिये कि मेरा बच्चा किस कंपनी में कितने बड़े पैकेज पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि सब कुछ धन ही नहीं होता धन से भी बढ़कर बच्चों में अंदर के संस्कार होते है। बचपन में जो संस्कार पड़ जाते है वह ही उनका भविष्य बनाते है। मुनि श्री ने कहा कि धन की चिंता मत करो जिसने चोंच दी है वह दाना भी देगा उन्होंने कहा कि आपने अपने बच्चे को पढ़ाई करने विदेश भेज दिया अथवा इंजीनियर बनाकर विदेश में अथवा महानगरों में पहुंचा दिया। बच्चे में यदि संस्कार होंगे तो वह मां बाप की परवाह करेगा अन्यथा जिन कागज के नोटों के लिये आपने उसे विदेश भेजा था उस धन को कमाने में वह इतना व्यस्त हो जाता है कि फिर उसके पास इतना समय ही नहीं होता कि वह भारत आकर अपने बूढे मां बाप की सेवा कर सके।
बड़े शान से कहते है कि मेरे दोनों बेटे विदेश में है!
उन्होंने बच्चों को एक सच्ची घटना सुनाते हुए कहा कि मध्यमवर्गीय जैन परिवार में दो बेटों का जन्म होता है। मां बाप दोनों बच्चों को उच्च शिक्षा के लिये विदेश भेजते हैं। बच्चे शिक्षा के साथ साथ वहीं सेटिल हो जाते हैं। कुछ दिनों तक उनकी मोबाइल पर बातचीत होती रहती है और वह भी बड़े शान से कहते है कि मेरे दोनों बेटे विदेश में उच्च पदों पर हैं। बच्चे थोड़े संस्कारित थे तो वह अपने माता-पिता को धन भी भेजते रहते थे। उनका विवाह हो गया और वह वहीं सैटल हो गए। इधर, बूढे मां-बाप अकेले थे और अपने बच्चों की याद करते करते उसकी मां बीमार पड़ जाती है तो पिता बच्चों को संदेश भेजते हैं कि तुम्हारी मां बीमार है और अपने बच्चे बहु नाती पोतों से मिलना चाहती है तो उधर से संदेश आता है कि आप उनका अच्छे से अच्छा अस्पताल में इलाज कराओ हमारे पास अभी समय नहीं है और मां का देहांत हो जाता है। इसकी सूचना पिता अपने दोनों बेटों को देता है तो उनके अंतिम संस्कार में छोटा बेटा अकेले पहुंचता है। पिता उससे पूछता है कि बड़का नहीं आया तो छोटा जबाब देता है कि भैया ने कहा है कि इस बार तुम चले जाओ अगली बार मैं चला जाऊंगा। जब पिता अपने यह संदेश सुनता है तो वह दुःखी होकर सुसाइड कर लेता है।
सबसे पहला धर्म अपने माता-पिता की सेवा है
एक और सच्ची घटना सुनाते हुये मुनि श्री ने कहा कि दो भाई थे। एक तो पढ़-लिखकर आईएएस अफसर बन गया और किसी महानगर में पहुंच गया। छोटा थोड़ा पढ़ने में कमजोर था सो उसने पढ़ाई की और अपनी पुस्तैनी दुकान संभाल ली और अपने माता-पिता की सेवा करता और साथ में रहता था लेकिन उसके माता-पिता तो बड़े बेटे बहू की ही तारीफ किया करते थे। इस बात से छोटे बेटे बहू को बहूत तकलीफ होती थी। वह कहता पिताजी सेवा तो आपकी हम ही करते हैं लेकिन, तारीफ आप हमेशा बड़े की करते हैं। ऐसी घटनाएं आजकल हर परिवार में आम हो गई है। उन्होंने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि सबसे पहला धर्म अपने माता-पिता की सेवा करने का ही होना चाहिए। जिन्होंने कितने कष्टों के साथ हमारा लालन-पालन किया और काबिल बनाया।
50 हजार बच्चों को स्वर्णप्राशन दवा दी जाएगी
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागरजी के द्वितीय समाधि दिवस 27 जनवरी को आ रहा है। उसके पूर्व 8 जनवरी गुरुवार को विदिशा नगर के सभी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों तथा समस्त आंगनवाड़ियों के माध्यम से श्री सकल दि. जैन समाज के महिला एवं पुरुष कार्यकर्ता उन स्कूलों में जाकर 50 हजार बच्चों को स्वर्णप्राशन दवा दी जाएगी। आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से पूर्णायु जबलपुर एवं दयोदय गौशाला बीना वारह के सहयोग से तैयार की गई है। इसके लिए रविवार दोपहर तीन बजे कार्यकर्ताओं की मीटिंग हुई। जिसमें उन सभी कार्यकर्ताओं को दवा पिलाने का प्रशिक्षण दिया गया।













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